“मुक्तक” तुझे छोड़ न जाऊँ री सैयां न कर लफड़ा डोली में।

07 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (42 बार पढ़ा जा चुका है)

शीर्षक --- भाषा/बोली/वाणी/इत्यादि समानार्थक


“मुक्तक”


तुझे छोड़ न जाऊँ री सैयां न कर लफड़ा डोली में।

क्या रखा है इस झोली में जो नहीं तेरी ठिठोली में।

आज के दिन तूँ रोक ले आँसू नैन छुपा ले नैनों से-

दिल ही दिल की भाषा जाने क्या रखा है बोली में॥-1


हंस भी मोती खाएगा, फिर एक दिन ऐसा आयेगा।

कागा अपने रंग में आकर, काँव-काँव चिल्लाएगा।

कोयल की बोली झोली में, हमजोली होगा सजना-

पी-पी पपीहा रटन सुनेगा, बादल जल भर लाएगा॥-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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महातम मिश्रा
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दिल से आभारी हूँ सम्मानित शब्दनगरी मंच का इस गज़ल को विशिष्ट रचना का सम्मान प्रदान करने के लिए, ॐ जय माँ शारदा!

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