अपनी परेशानी

10 सितम्बर 2018   |  डॉ बृजेन्द्र कुमार अग्निहोत्री   (40 बार पढ़ा जा चुका है)

जब था छोटा

गाँव में, घर में

सबका प्यारा, सबका दुलारा

थोडा सा कष्ट मिलने पर

माँ के कंधे पर

रखकर अपना सिरसर

होकर दुनिया से बेखबर

बहा देता, अपने सारे अश्क

माँ के हाथ की थपकियाँ

देती सांत्वना

साहस व झपकियाँ

समय ने, परिस्थितियों ने

उम्र से पहले बड़ा कर दिया

अब जब भी

जरूरत महसूस करता

सांत्वना, आश्वासन की

माँ के पास जाता हूँ

जैसे ही रखता हूँ

उनके कंधे पर सिर

उनकी आँखों से

निकलने लगता है ग़मों का पानी

भूल जाता हूँ, मैं

अपनी सारी परेशानी

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अलोक सिन्हा
12 सितम्बर 2018

बहुत अच्छी रचना है -- भावपूर्ण भी और मार्मिक भी |

रेणु
11 सितम्बर 2018

प्रिय बृजेंद्र जी --- बहुत भावपूर्ण रचना है | सस्नेह शुभकामनाएं

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