“छंद मुक्त काव्य“ (मैं इक किसान हूँ)

14 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (108 बार पढ़ा जा चुका है)

“छंद मुक्त काव्य“ (मैं इक किसान हूँ)

किस बिना पै कह दूँ कि मैं इक किसान हूँ

जोतता हूँ खेत, पलीत करता हूँ मिट्टी

छिड़कता हूँ जहरीले रसायन घास पर

जीव-जंतुओं का जीना हराम करता हूँ

गाय का दूध पीता हूँ गोबर से परहेज है

गैस को जलाता हूँ पर ईधन बचाता हूँ

अन्न उपजाता हूँ गीत नया गाता हूँ

आत्महत्या के लिए हैवान बन जाता हूँ

कहते हैं लोग कि मैं भूख का निदान हूँ

किस बिना पै कह दूँ कि मैं इक किसान हूँ॥

ठंड में काँपता हूँ बरसात में भीगता हूँ

गरमी में पराली जलाकर शरीर सेंकता हूँ

उधार का बीज, उधार की खाद डालता

ब्याज के लिए तिमाही तौलता हूँ अनाज

चूहों से मिन्नते करता हूँ उन्हें समझाता हूँ

किश्त दर किश्त दीपावली सी पुजा करता हूँ

मूर कब घटता है मैं ही कूढ़ता हूँ पकता हूँ

खुद के लिए ही शायद शैतान बन जाता हूँ

लोग सम्मान में कहते हैं मैं कल का बिहान हूँ

किस बिना पै कह दूँ कि मैं इक किसान हूँ॥

महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: “मुक्तक” (छंद - हरिगीतिका)



महातम मिश्रा
19 सितम्बर 2018

दिल से आभारी हूँ सम्मानित शब्दनगरी मंच का इस गज़ल को विशिष्ट रचना का सम्मान प्रदान करने के लिए, ॐ जय माँ शारदा!

महातम मिश्रा
17 सितम्बर 2018

बिलकुल सही बहन बहुत ही विडम्बना है समाज में जिससे कवि घायल है और कलम बेपरवाह

रेणु
16 सितम्बर 2018

आदरणीय भैया -- धरतीपुत्र के अंतस की पीड़ा को शब्द देती भावपूर्ण रचना को पढ़कर मुझे किसानों के आक्रांत बुझे मुखड़े याद हो आये जो खेती किसानी करते उत्साह से लबरेज रहते हैं पर फसल की उगाही के वक्त अपराधी जैसे हो जाते हैं | सबकी थाली को अन्न से सजाता है ये भे दोष कम नहीं उसका ? बहुत मर्मान्तक रचना के लिए निशब्द हूँ | बस आभार |

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