"कुंडलिया" कटना अपने आप का, देख हँस रहा वृक्ष।

14 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (62 बार पढ़ा जा चुका है)

"कुंडलिया"  कटना अपने आप का, देख हँस रहा वृक्ष।

"कुंडलिया"


कटना अपने आप का, देख हँस रहा वृक्ष।

शीतल नीर समीर बिन, हाँफ रहा है रिक्ष।।

हाँफ रहा है रिक्ष, अभिक्ष रहा जो वन का।

मत काटो अब पेड़, जिलाते जी अपनों का।।

कह गौतम कविराय, शुभ नहिं नदी का पटना।

जल को जीवन जान, रोक अब वृक्ष का कटना।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: “मुक्तक” (छंद - हरिगीतिका)



महातम मिश्रा
17 सितम्बर 2018

हार्दिक हार्दिक धन्यवाद बहन , खुश रहो

रेणु
16 सितम्बर 2018

आदरणीय भैया -- सादर नमन | आपकी इस मर्मस्पर्शी रचना को पढकर मन सोचने पर मजबूर हुआ कि वृक्ष की इस विद्रूप हंसी में मानव अपने विनाश की आहट क्यों नहीं सुनता ? बहुत ही सार्थक रचना के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनायें |

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