“मुक्तक” हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह।

14 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (95 बार पढ़ा जा चुका है)

हिन्दी दिवस के सुअवसर पर आप सभी को दिल से बधाई सह शुभकामना, प्रस्तुत है मुक्तक....... ॐ जय माँ शारदा......!


“मुक्तक”


हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह।
अपनी भाषा को मिला, संवैधानिक छाँह।
चौदह तारिख खिल गया, दे दर्जा सम्मान-
धूम-धाम से मन रहा, प्रिय त्यौहारी चाह॥-1


बहुत बधाई आप को, देशज मीठी बोल।
सगरी भाषा बहन सम, मिल जाती दिल खोल।
लिखना-पढ़ना सहज है, अक्षर शब्द समान-
भाव-भंगिमा आपसी, हिंदी है अनमोल॥-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: “मुक्तक” (छंद - हरिगीतिका)



महातम मिश्रा
17 सितम्बर 2018

हार्दिक बधाई बहन राजभाषा के लिए

रेणु
16 सितम्बर 2018

हिंदी को समर्पित सुंदर रचना आदरणीय भैया | आपको भी देर ही सही हार्दिक शुभकामनायें हिंदी दिवस की | सादर प्रणाम |

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
10 सितम्बर 2018
"
क़ाफ़िया— ई स्वर कीबंदिश, रदीफ़- सादगी से"गज़ल" रुला कर हँसाते बड़ी सादगी सेगुलिस्तां खिलातेअजी सादगी सेहवा में निशानालगाने के माहिरपखेरू उड़ाते दबीसादगी से।।परिंदों के घर मेंनहीं मादगी परहिला डाल देते मिलीसादगी से।।शिकारी कहूँ याअनारी कहूँ तुम सजाते हो महफ़िलदिली सादगी से।।लपक जा रहे थे उड़ेथे फलक कोबिना
10 सितम्बर 2018
14 सितम्बर 2018
बहुत सी बोलियों और भाषाओं वाले हमारे देश में आजादी के बाद भाषा को लेकर एक बड़ा सवाल आ खड़ा हुआ. आखिरकार 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया. हालांकि शुरू में हिंदी और अंग्रेजी दोनो को को नए राष्ट्र की भाषा चुना गया और संविधान सभा ने देवनागरी लिपि वाली हिं
14 सितम्बर 2018
04 सितम्बर 2018
छंद - हरिगीतिका(मात्रिक) मुक्तक, मापनी- 2212 2212 2212 2212“मुक्तक” (छंद -हरिगीतिका)फैले हुए आकाश मेंछाई हुई है बादरी। कुछ भी नजर आतानहीं गाती अनारी साँवरी। क्यों छुप गई है ओटलेकर आज तू अपने महल- अब क्या हुआ का-जलबिना किसकी चली है नाव री॥-1क्यों उठ रही हैरूप लेकर आज मन में भाँवरी। क्यों डूबने कोहरघड़
04 सितम्बर 2018
10 सितम्बर 2018
"
"पद"मोहन मुरली फिर नबजानाराह चलत जल गगरीछलके, पनघट चुनर भिगाना।लाज शरम की रहनहमारी, मैँ छोरी बरसाना।।गोकुल ग्वाला बालाछलिया, हरकत मन बचकाना।घूरि- घूरि नैनामलकावें, बात करत मुसुकाना।।अब नहिं फिर मधुबनको आऊँ, तुम सौ कौन बहाना।रास रचाना बिनुराधा के, और जिया पछिताना।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
10 सितम्बर 2018
12 सितम्बर 2018
हर कोई खुद की आज़ादी चाहता है पर दूसरे को आज़ादी देने से कतराता है. हर किसी को फक्र है अपने मज़हब पर अपनी जात या नस्ल पर, पर किसी को परवाह नहीं उस परवरदिगार की जो इन सबसे ऊपर है जिसने हर किसी को बनाया है. उसके यहाँ तो ना कोई मज़हब है ना जात ना ही कोई नस्ल, उसके यहाँ अगर कुछ ह
12 सितम्बर 2018
14 सितम्बर 2018
"कुंडलिया"कटना अपने आप का, देख हँस रहा वृक्ष।शीतल नीर समीर बिन, हाँफ रहा है रिक्ष।।हाँफ रहा है रिक्ष, अभिक्ष रहा जो वन का।मत काटो अब पेड़, जिलाते जी अपनों का।।कह गौतम कविराय, शुभ नहिं नदी का पटना।जल को जीवन जान, रोक अब वृक्ष का कटना।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
14 सितम्बर 2018
17 सितम्बर 2018
काफ़िया- आ स्वर, रदीफ़- रह गया शायद“गज़ल”जुर्म को नजरों सेछुपाता रह गया शायदव्यर्थ का आईनादिखाता रह गया शायद सहलाते रह गया कालेतिल को अपने नगीना है सबकोबताता रह गया शायद॥ धीरे-धीरे घिरती गईछाया पसरी उसकी दर्द बदन सिरखुजाता रह गया शायद॥ छोटी सी दाग जबनासूर बन गई माना मर्ज गैर मलहमलगाता रह गया शायद॥
17 सितम्बर 2018
14 सितम्बर 2018
“छंद मुक्त काव्य“(मैं इक किसान हूँ) किस बिना पै कह दूँकि मैं इक किसान हूँजोतता हूँ खेत, पलीत करता हूँ मिट्टी छिड़कता हूँ जहरीलेरसायन घास पर जीव-जंतुओं का जीनाहराम करता हूँ गाय का दूध पीताहूँ गोबर से परहेज है गैस को जलाता हूँपर ईधन बचाता हूँ अन्न उपजाता हूँगीत नया गाता हूँ आत्महत्या के लिएहैवान बन जा
14 सितम्बर 2018
07 सितम्बर 2018
शीर्षक ---भाषा/बोली/वाणी/इत्यादि समानार्थक“मुक्तक”तुझे छोड़ न जाऊँ रीसैयां न कर लफड़ा डोली में। क्या रखा है इसझोली में जो नहीं तेरी ठिठोली में। आज के दिन तूँ रोकले आँसू नैन छुपा ले नैनों से-दिल ही दिल की भाषाजाने क्या रखा है बोली में॥-1 हंस भी मोती खाएगा, फिर एक दिन ऐसा आयेगा। कागा अपने रंग मेंआकर,
07 सितम्बर 2018
18 सितम्बर 2018
गीतिका आधार छंद- शक्ति , मापनी 122 122 122 12, समांत-ओगे, पदांत- नहीं “गीतिका”बनाया सजाया कहोगे नहीं गले से लगाया सुनोगे नहीं सुना यह गली अब पराई नहीं बुलाकर बिठाया हँसोगे नहीं॥बनाकर बिगाड़े घरौंदे बहुत महल यह सजाकर फिरोगे नहीं॥बसाये न जाते शहर में शहर नगर आज फिर से घुमोगे नहीं॥चलो शाम आई सुहानी बहु
18 सितम्बर 2018
31 अगस्त 2018
“मुक्तक” फिंगरटच ने कर दिया, दिन जीवन आसान। मोबाइल के स्क्रीनपर, दिखता सकल जहान। बिना रुकावट मान लो, खुल जाते हैं द्वार- चाहा अनचाहा सुलभ, लिखो नाम अंजान॥-1 बिकता है सब कुछयहाँ, पर न मिले ईमान। हीरा पन्ना अरु कनक, खूब बिके इंसान। बिन बाधा बाजार में, बे-शर्ती उपहार- हरि प्रणाम मुस्कानसुख, सबसे बिन पह
31 अगस्त 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x