“मुक्तक” हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह।

14 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (117 बार पढ़ा जा चुका है)

हिन्दी दिवस के सुअवसर पर आप सभी को दिल से बधाई सह शुभकामना, प्रस्तुत है मुक्तक....... ॐ जय माँ शारदा......!


“मुक्तक”


हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह।
अपनी भाषा को मिला, संवैधानिक छाँह।
चौदह तारिख खिल गया, दे दर्जा सम्मान-
धूम-धाम से मन रहा, प्रिय त्यौहारी चाह॥-1


बहुत बधाई आप को, देशज मीठी बोल।
सगरी भाषा बहन सम, मिल जाती दिल खोल।
लिखना-पढ़ना सहज है, अक्षर शब्द समान-
भाव-भंगिमा आपसी, हिंदी है अनमोल॥-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: “मुक्तक” (छंद - हरिगीतिका)



महातम मिश्रा
17 सितम्बर 2018

हार्दिक बधाई बहन राजभाषा के लिए

रेणु
16 सितम्बर 2018

हिंदी को समर्पित सुंदर रचना आदरणीय भैया | आपको भी देर ही सही हार्दिक शुभकामनायें हिंदी दिवस की | सादर प्रणाम |

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
03 सितम्बर 2018
*हिन्दी खबर* चैनल विस्तार कर रहा है। *यूपी, एमपी, उत्तराखंड एवं छत्तीसगढ़* में सफलतापूर्वक संचालन के बाद अब राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू कश्मीर, बिहार, झारखंड, गुजरात और महाराष्ट्र में *प्रदेश प्रतिनिधि/स्टेट हेड/ब्यूरो चीफ* की नियुक्तियां की जा रहीं हैं।अधिक जानकारी के लिए निचे दी
03 सितम्बर 2018
04 सितम्बर 2018
"
वज़्न- 1222 12222122 2, काफ़िया-आ, रदीफ़ - " करते हैं इशारोमें""गज़ल"चलो जी कुछ ख़ताकरते हैं इशारों मेंबवंडर ही खड़ा करतेहै इशारों मेंकहाँ तक चल सकेंगेदिनमान चुप होकरजलाते है अगन दीयाहै इशारों में।।नयी जब रोशनी होगीतम फ़ना होगाउड़ाते हैं वोफतिंगा हैं इशारों में।।भरा पानी शहर मेंले आग मत जानाबुझे मन का ठिकान
04 सितम्बर 2018
31 अगस्त 2018
“मुक्तक” फिंगरटच ने कर दिया, दिन जीवन आसान। मोबाइल के स्क्रीनपर, दिखता सकल जहान। बिना रुकावट मान लो, खुल जाते हैं द्वार- चाहा अनचाहा सुलभ, लिखो नाम अंजान॥-1 बिकता है सब कुछयहाँ, पर न मिले ईमान। हीरा पन्ना अरु कनक, खूब बिके इंसान। बिन बाधा बाजार में, बे-शर्ती उपहार- हरि प्रणाम मुस्कानसुख, सबसे बिन पह
31 अगस्त 2018
07 सितम्बर 2018
शीर्षक ---भाषा/बोली/वाणी/इत्यादि समानार्थक“मुक्तक”तुझे छोड़ न जाऊँ रीसैयां न कर लफड़ा डोली में। क्या रखा है इसझोली में जो नहीं तेरी ठिठोली में। आज के दिन तूँ रोकले आँसू नैन छुपा ले नैनों से-दिल ही दिल की भाषाजाने क्या रखा है बोली में॥-1 हंस भी मोती खाएगा, फिर एक दिन ऐसा आयेगा। कागा अपने रंग मेंआकर,
07 सितम्बर 2018
04 सितम्बर 2018
छंद - हरिगीतिका(मात्रिक) मुक्तक, मापनी- 2212 2212 2212 2212“मुक्तक” (छंद -हरिगीतिका)फैले हुए आकाश मेंछाई हुई है बादरी। कुछ भी नजर आतानहीं गाती अनारी साँवरी। क्यों छुप गई है ओटलेकर आज तू अपने महल- अब क्या हुआ का-जलबिना किसकी चली है नाव री॥-1क्यों उठ रही हैरूप लेकर आज मन में भाँवरी। क्यों डूबने कोहरघड़
04 सितम्बर 2018
08 सितम्बर 2018
<!--[if gte mso 9]><xml> <o:OfficeDocumentSettings> <o:RelyOnVML/> <o:AllowPNG/> </o:OfficeDocumentSettings></xml><![endif]--><!--[if gte mso 9]><xml> <w:WordDocument> <w:View>Normal</w:View> <w:Zoom>0</w:Zoom> <w:TrackMoves/> <w:TrackFormatting/> <w:PunctuationKerning/> <w:ValidateAgainstSc
08 सितम्बर 2018
05 सितम्बर 2018
“छन्द मुक्त काव्य”“शहादत की जयकारहो”जब युद्ध की टंकारहो सीमा पर हुंकार हो माँ मत गिराना आँखआँसू माँ मत दुखाना दिलहुलासूजब रणभेरी की पुकारहो शहादत की जयकारहो।। जब गोलियों कीबौछार होजब सीमा पर त्यौहारहो माँ भेज देना बहनकी राखी अपने सीने कीबैसाखी वीरों की कलाईगुलजार हो शहादत की जयकार हो॥जब चलना दुश्वार
05 सितम्बर 2018
04 सितम्बर 2018
छंद - हरिगीतिका(मात्रिक) मुक्तक, मापनी- 2212 2212 2212 2212“मुक्तक” (छंद -हरिगीतिका)फैले हुए आकाश मेंछाई हुई है बादरी। कुछ भी नजर आतानहीं गाती अनारी साँवरी। क्यों छुप गई है ओटलेकर आज तू अपने महल- अब क्या हुआ का-जलबिना किसकी चली है नाव री॥-1क्यों उठ रही हैरूप लेकर आज मन में भाँवरी। क्यों डूबने कोहरघड़
04 सितम्बर 2018
12 सितम्बर 2018
हर कोई खुद की आज़ादी चाहता है पर दूसरे को आज़ादी देने से कतराता है. हर किसी को फक्र है अपने मज़हब पर अपनी जात या नस्ल पर, पर किसी को परवाह नहीं उस परवरदिगार की जो इन सबसे ऊपर है जिसने हर किसी को बनाया है. उसके यहाँ तो ना कोई मज़हब है ना जात ना ही कोई नस्ल, उसके यहाँ अगर कुछ ह
12 सितम्बर 2018
01 सितम्बर 2018
बहुत दिनों से हजारों बातों को दबाएं बैठा हुआ हूं,ये जो क्या...डिजीटल चिट्ठी चली है न अपने तो समझ से ऊपर है। चचा जान अच्छा हुआ आज आप हो नही..,नही तो देश की वास्तविकता से जूझ रही धरती माँ को तड़पते ही देखते। इस न जाने डिजीटल दुनिया में क्या है कि लोग अपनी वास्तविकता ओर पहचान से शर्म खाते हैं। चचा जान
01 सितम्बर 2018
31 अगस्त 2018
“मुक्तक” फिंगरटच ने कर दिया, दिन जीवन आसान। मोबाइल के स्क्रीनपर, दिखता सकल जहान। बिना रुकावट मान लो, खुल जाते हैं द्वार- चाहा अनचाहा सुलभ, लिखो नाम अंजान॥-1 बिकता है सब कुछयहाँ, पर न मिले ईमान। हीरा पन्ना अरु कनक, खूब बिके इंसान। बिन बाधा बाजार में, बे-शर्ती उपहार- हरि प्रणाम मुस्कानसुख, सबसे बिन पह
31 अगस्त 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x