"मुक्त काव्य" जी करता है जाकर जी लू , बोल सखी क्या यह विष पी लू

19 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (86 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्त काव्य"


जी करता है जाकर जी लू

बोल सखी क्या यह विष पी लू

होठ गुलाबी अपना सी लू

ताल तलैया झील विहार

सुख संसार घर परिवार

साजन से रूठा संवाद

आतंक अत्याचार व्यविचार

हंस ढो रहा अपना भार

कैसा- कैसा जग व्यवहार

होठ गुलाबी अपना सी लू

बोल सखी क्या यह विष पी लू॥


डूबी खेती डूबे बाँध

झील बन गई जीवन साध

सड़क पकड़ती जब रफ्तार

हो जाता जीवन दुश्वार

मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में

बैठा है पालक करतार

कहाँ- कहाँ नैवेद्य चढाऊँ

किसकी गाऊँ किस दर जाऊँ

कैसे इसका जीवन जी लू

बोल सखी क्या यह विष पी लू......

सुघर गाल पर राख मलू री॥


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "गज़ल" रुला कर हँसाते बड़ी सादगी से



महातम मिश्रा
20 सितम्बर 2018

बहुत बहुत धन्यवाद बहन इस रचना का मर्म उजागर करने के लिए, आशीर्वाद

रेणु
19 सितम्बर 2018

सखी का सखी से ये आन्क्रांत मन का संवाद बहुत ही हृदयस्पर्शी है आदरणीय भइया|

डूबी खेती डूबे बाँध
झील बन गई जीवन साध
सड़क पकड़ती जब रफ्तार
हो जाता जीवन दुश्वार
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में
बैठा है पालक करतार
कहाँ- कहाँ नैवेद्य चढाऊँ
किसकी गाऊँ किस दर जाऊँ
कैसे इसका जीवन जी लू
बोल सखी क्या यह विष पी लू......
सुघर गाल पर राख मलू री॥

क्या बात है !!!! गाल पर राख मलने तक की नौबत आ गयी ! बहुत सुघड़ सरस रचना के लिए हार्दिक शुभकामनायें |

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