हो सके तो मुझे माफ़ करना नम्बी!

19 सितम्बर 2018   |  रवीन्द्र सिंह यादव   (123 बार पढ़ा जा चुका है)


समाचार आया है -


"इसरो के वैज्ञानिक को मिला 24 साल बाद न्याय"


न्याय के लिये दुरूह संघर्ष


नम्बी नारायण लड़ते रहे चौबीस वर्ष


इसरो जासूसी-काण्ड में

पचास दिन जेल में रहे


पुलिसिया यातनाओं के

थर्ड डिग्री टॉर्चर भी सहे


सत्ता और सियासत के खेल में


प्रोफ़ेसर नम्बी पहुँचे सलाख़ों के पीछे


क्रायोजेनिक इंजिन

विकसित करने की दौड़ में

देश चला गया वर्षों पीछे




1994 में ख़बर पढ़कर


मेरा भी मन खिन्न हुआ था


मीडिया के लिये वैज्ञानिक


सनसनी का जिन्न हुआ था


मीडिया का चरित्र


प्रचार-प्रसार से जुड़ा है


चरित्र हनन से भी


इसकी तिजोरी में पैसा जुड़ा है


मीडिया ने 1994 में

महान तन्मयता दिखाई थी


2018 में अब क्यों है

हालत खिसियाई-सी


मैंने भी आपको

तब गद्दार, देशद्रोही,लालची


और जाने क्या-क्या समझा था


काश! मीडिया आज

उन सबको सच बताता


जिन्होंने वैज्ञानिक को

ग़लत समझा था


जाने कितने देशवासी


ग़लतफ़हमी लिये

स्वर्ग सिधार गये


उनके अपने कलंक की कालख


धोते-धोते

जीवनबोध का मर्म हार गये




जासूसी के आरोप लगे 1994 में


सीबीआई ने क्लीन चिट दी 1996 में


सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया 1998 में

मान-प्रतिष्ठा बहाली, मुआवज़े की

लम्बी लड़ाई का अंत 2018 में




सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर

साज़िश की जाँच होगी


सम्बंधित अधिकारियों से

50 लाख रुपये की बसूली होगी


हम देखेंगे

वैज्ञानिक प्रतिभा की

हत्या की बात

किसने अपने सर ली होगी


स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजिन

विकसित करने में हुई देरी से


देश को हुई क्षति की

भरपाई करेगा कौन


विदेशी हाथ होने के

ज़िक्र पर सब रहेंगे मौन




क्रायोजेनिक इंजन

टेक्नोलॉजी-ट्रांसफ़र समझौता


हुआ 1992 में भारत-रूस के साथ


अमेरिका नेमकाया था

बदहाल रूस को


ख़ैरात के एहसान और

एकध्रुवीय महाशक्ति

होने के रसूख़ के साथ


ज़रूरतमंद रूस ने

क्रायोजेनिक तकनीक का


समझौता किया था

235 करोड़ रुपये में


फ़्रांस तैयार था

650 करोड़ रुपये में


चतुर व्यापारी अमेरिका

देना चाहता था

950 करोड़ रुपये में


दवाब में रूस ने

पाँव पीछे खींचे

सौदे के पर खींचे


नम्बी नारायण ने

स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन


विकसित करने के

तब ख़ाके खींचे


5 जनवरी 2014 को

क्रायोजेनिक इंजन का


परीक्षण भारत में सफल हुआ


अपना उल्लेख ख़बरों में पाकर


एक वैज्ञानिक भाव विह्वल हुआ




एक वैज्ञानिक को

इंसाफ़ मिलने में


सदी का एक चौथाई

समय ख़र्च होता है


ग़रीब नागरिक तो

ज़िंदगीभर इंसाफ़ के लिये


एड़ियाँ रगड़ते हुए

लाचारी का बोझ ढोता है




हो सके तो

मुझे माफ़ करना नम्बी!


मेरा नाम भी

उन गुनाहगारों की

लम्बी फ़ेहरिस्त में शामिल है


जो आपको 1994 में

जी भरकर कोस रहे थे


आपके भारतीय नागरिक होने पर

मन भर मन मसोस रहे थे......... !



आपको सादर नमन नम्बी!


जो आपने वक़्त की बेरुख़ी


और मानसिक वेदना को

निताँत ख़ामोशी से सहा


अपने भोले देशवासियों को

कुछ नहीं कहा!!

"रेडी टू फ़ायर" ने हमसे

दिल दहलाती दास्तान का दर्द

शिद्दत से कहा है !!!


© रवीन्द्र सिंह यादव


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रेणु
20 सितम्बर 2018

आज तो ब्लॉग जगत के दिग्गजों ने शब्द नगरी मंच को अपनी प्रतिभा से चकित कर रखा है | सभी प्रमुख पृष्ठ पर छाए हैं | आपकी रचना को '' आज का लेख चुने जाने पर आपको हार्दिक बधाई रविन्द्र जी |

रेणु
20 सितम्बर 2018

आदरनीय रविन्द्र जी -- ईमानदारी से कहूं तो आपकी रचना से पहले मैं इस प्रकरण से परिचित नहीं थी पर आपकी रचना पढने के बाद मैंने गूगल पर इसके बारे में जाना - तो बहुत आश्चर्य नहीं हुआ | ऐसा अनैतिक और कुत्सित आचरण भारतवर्ष का भाग्य बन चुका है | इसरो जैसे महत्वपूर्ण विभागों में इस तरह की साजिशें औरसच्ची प्रतिभाओं का मानमर्दन करना स्तब्ध कर देने वाला है | इस देश से शिक्षा ले अनेक राष्ट्र सौ प्रतिशत इमानदार हो गये पर नैतिकता के मापदंडों पर ये संस्कारी राष्ट्र कहीं पीछे रह गया | एक मेधावी वैज्ञानिक का यूँ सामाजिक और राष्ट्रीय तिरस्कार निंदनीय है और दंडनीय भी साथ में अक्षम्य अपराध भी | आपने बहुत ही सचाई से लिखा| हम सभी कही ना कभी मीडिया की छद्म कवरेज के शिकार हो झूठ को सच मानने में देर नहीं लगाते | अपने भीतर अपनी वेदना को समेटे और न्याय की आस लगये बरसों से प्रतीक्षित माननीय नम्बी नारायण जी से हम सभी को जरुर माफ़ी मंगनी चाहिए | आपकी समसामयिक विषय पर इस सार्थक रचना हेतु आप निश्चित रूप से बधाई के साथ मुक्त कंठ से प्रशंसा के पात्र हैं | आपको हार्दिक आभार इस विषय को गहराई से अवगत कराने के लिए | सादर --

अलोक सिन्हा
20 सितम्बर 2018

बहुत अच्छा लिखा है | प्रशंसनीय |

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