वो लडकी

25 सितम्बर 2018   |  गौरीगन गुप्ता   (73 बार पढ़ा जा चुका है)

क्या दोष था मेरा बस मैं एक लडकी थी अपना बोझ हल्का करने का जिसे बालविवाह की बलि चढा दिया मैं लिख पढकर समाज का दस्तूर मिटा एक नई राह बनाना चाहती थी मजबूर, बेवश,मंडप की वेदी पर बिठा दिया दुगुनी उम्र के वर से सात फेरे पडवा दिए वक्त की मार बिन बुलाए चली आई छीट की चुनरिया के सब रंग धुल गए कल की शुभ लक्ष्मी आज कलंकनी, बन गई जगरीति निभाने जन्मदाता आए समझा बुझा गये जहां डोली आती, वहा से अर्थी उठती मायके के आसरे की धुंध थी वो भी छट गई अब साया भी अपशकुनी बन गया नादान मन में समझ रीति की ना आई बस कुछ समझ आता था तो वो कल तक जो सोलह श्रृंगार की स्वामिनी थी अब सफेद साडी में लिपटी भावशून्य कोला कागज सा जीवन हो गया ये और कोई नहीं मेरे सामने पली बढी मैंने ही उसे किताबी ज्ञान कराया रानी लक्ष्मीबाई का पाठ पढाया पर रानी बनना ना सिखाया उसकी भावशून्य ऑटो मुझसे सवाल है करते क्या जबाव देती पुरजोर कोशिश की पर मुझे सीमाओं मेरे बांध दिया उसका यह वैधव्य रूप देख मन अपने आपको कचोटता है उसका खेलता बचपन क्यों ना बचा पाये परवाह किए बिना जंग छेड देती उफ! अफसोस भर रह गया बस अफसोस भर रह गया

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