वो लौट के नहीं आआई

25 सितम्बर 2018   |  गौरीगन गुप्ता   (140 बार पढ़ा जा चुका है)

लाठी की टेक लिए चश्मा चढाये , सिर ऊँचा कर मां की तस्वीर पर एकटक टकटकी लगाए पश्चाताप के ऑंसू भरे लरजती जुवान कह रही हो कि तुम लौट कर क्यों नहीं आई शायद खफा मुझसे बस, इतनी सी हुई हीरे को कांच समझता रहा समर्पण भाव को मजबूरी का नाम देता हठधर्मिता करता रहा जानकर भी, नकारता रहा फिर, पता नहीं कौन सी बात दिल को लगा बैठी और एक दिन यूं रूठकर चली गई अपने आप को कोसता रहा लौट आने की मंदिरों में मन्नतें मांगता रहा गुहार करता रहा तुमसे दो शब्द कहना चाहता हूँ तुम तो दया की मूरत मेरे प्रतिकारो को विस्मृत करके लौट आओ लेकिन समझता हूं कि तुम्हारे लौट के ना आने का

अगला लेख: जन्मसिद्धता



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
02 अक्तूबर 2018
सदा सहज हो जीवन दाता कटुटा ना अपनाऊँ मानवता हित सदा समर्पित का जीवनदर्शन अपनाऊँ । जिस हित बना बना राष्ट्र यह उस हित बलि बलिदान सदा अपने को पाऊँ नाथ मालिक ईश है सृष्टा उसकी मर्जी पर चल पाऊँ नारी सम्मान सतत् जीवन माता का जीवन भारी भार ऋण से सदा
02 अक्तूबर 2018
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x