नेह तुलिका --

06 अक्तूबर 2018   |  रेणु   (67 बार पढ़ा जा चुका है)

नेह तुलिका --

रंग दो मन की कोरी चादर
हरे ,गुलाबी , लाल , सुनहरी
रंग इठलायें जिस पर खिलकर !!

सजे सपने इन्द्रधनुष के -
नीड- नयन से मैं निहारूं
सतरंगी आभा पर इसकी -
तन -मन मैं अपना वारूँ
बहें नैन -जल कोष सहेजे--
मुस्काऊँ नेह -अनंत पलक भर !!

स्नेहिल सन्देश तुम्हारे -
नित शब्दों में तुमसे मिल लूं -
यादों के गलियारे भटकूँ -
फिर से बीते हर पल जी लूं ;
डूबूं आकंठ उन घड़ियों में -
दुनिया की हर सुध बिसराकर

अनंत मधु मिठास रचो तुम
आहत मन की आस रचो तुम
रचो प्रीत उत्सव कान्हा बन -
जीवन का मधुमास रचो तुम
खिलो कंवल बन मानसरोवर
सजो अधर चिर हास तुम बनकर !!!!!!!!!
चित्र -- पञ्च लिंकों से साभार --
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नेह तुलिका --

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कामिनी सिन्हा
09 अक्तूबर 2018

फिर से बीते हर पल जी लू,डूबू आकंठ उन घडियो में ,दुनिया की हर सुध बिसरा कर ,बहुत खूब ,बीते हुए पल की यादे बहुत मधुर है ,स्नेह

रेणु
11 अक्तूबर 2018

प्रिय बहन कामिनी -- आपको रचना पसंद आई बहुत खुश हूँ | यूँ ही कभी कभी कुछ लिख लेती हूँ |सस्नेह आभार |

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