जन्मसिद्धता

08 अक्तूबर 2018   |  गौरीगन गुप्ता   (43 बार पढ़ा जा चुका है)

जन्मसिद्धता तू ही नहीं, सभी खुश थे मेरे दुनियां में आने की खबर सुन लेकिन जब किलकारी गूंजी तेरे घर आंगन में मायूस भरे उदास चेहरे हुए कारण समझ ना पाई पर तू जग की रीति निर्वाह अनबूझ रही मुझसे क्या मैं चिराग नहीं दहेज ढोने वाली ठुमके ठुमक करते पग फूटी आँख किसी को ना सुहाते स्वतंत्रता पर प्रश्न चिन्ह लगाया पर तू उदास क्यों? भावहीन दुनियां में सोचती सवाल का जबाब तलाशती जन्मसिद्धता को उतावली लेकिन तेरे दिए संस्कारों ने निर्मम जमाने से जूझना सिखाया जमाने से जडवत रेखाओं को लांघकर,पुरूषवर्चस्वता को तोडा डगमगाते, गिरते, फिर संभलते हौसले हुए बुलंद, मुखर हुई चाहते हमारा वजूद, हमारा मुकाम बदलते वक्त के साथ दकियानूसी तस्वीर बदली।

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