"मुक्तक"

13 अक्तूबर 2018   |  महातम मिश्रा   (77 बार पढ़ा जा चुका है)

“मुक्तक”


कतरा-कतरा माँ तेरा है।

पुतरा पुतरा माँ तेरा है।

शीश निछावर करते वीरा-

सुंदर अँचरा माँ तेरा है।।


गर्वित होते लाल हजारों।

सीमा प्रहरी नायक यारो।

दुश्मन के छक्के छुट जाते-

नमन शहीद धन्य दिग चारो।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: चपैय्या छंद, हे माँ जग जननी, तुम्हरी अवनी, नाम रूप जगदंबा। शक्ति पीठ बावन, अतिशय पावन, नमन करूँ माँ अंबा।।



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"मुक्तक" कितना मुश्किल कितना निश्छल, होता बचपन गैर बिना।जीवन होता पावन मंदिर, मूरत सगपन बैर बिना।किसकी धरती किसका बादल, बरसाते नभ उत्पात लिए-बच्चों की हर अदा निराली, लड़ते- भिड़ते खैर बिना।।-1प्रत्येक दीवारें परिचित हैं, इनकी पहचान निराली।जग की अंजानी गलियारी, है सूरत भोली-भाली।हँसती रहती महफ़िल इनकी,
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