"दोहावली"

13 अक्तूबर 2018   |  महातम मिश्रा   (67 बार पढ़ा जा चुका है)

"दोहावली"


हँसते मिलते खेलते, दिल हो जाता खास।

प्रेम गली का अटल सच, आपस का विश्वास।।-1


राधा को कान्हा मिले, मधुवन खुश्बू वास।

थी मीरा की चाहना, मोहन रहते पास।।-2


गोकुल की गैया भली, थी कान्हा के पास।

ग्वाल-बाल की क्या कहें, हुए कृष्ण के दास।।-3


यशुदा के दरबार में, दूध दही अरु छास।

मोहन मिश्री ले उड़े, माखन मुख लपटास।।-4


गोपी ले गागर चली, पनघट खेलत रास।

निर्मल धुन मुरली बजी, जल यमुना अति पास।।-5


गोवर्द्धन उँगली चढ़ा, इंद्र हुए निराश।

नाग कालिया भग गया, पूरण प्रभु विश्वास।।-6


मथुरा से गोकुल गए, नगरी है अति खास

कृष्ण द्वारिका धाम प्रभु, अपनो पर विश्वास।।-7


राजा अपने राज का, होता है अति खास।

फिर भी देखो हो रहा, बिना बात परिहास।।-8


कैसी -कैसी नीति है, कैसी-कैसी आस।

खींच रहे है मिल सभी, कुर्सी कितनी खास।।-9


वीर सिपाही दे रहा, पहरा सीमा पास।

हम लालच में खेलते, बावन पत्ता तास।।-10


अब तो तनिक विराम दें, मुँह की बोली खास।

खुद अपने को तौलकर, करें खूब परिहास।।-11


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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