उलझन -- लघु कविता

14 अक्तूबर 2018   |  रेणु   (75 बार पढ़ा जा चुका है)

उलझन -- लघु कविता - शब्द (shabd.in)

इक मधुर एहसास है तुम संग -

ये अल्हड लडकपन जीना ,

कभी सुलझाना ना चाहूं -

वो मासूम सी उलझन जीना !


बीत ना मन का मौसम जाए -

चाहूं समय यहीं थम जाए ;

हों अटल ये पल -प्रणय के साथी -

भय है, टूट ना ये भ्रम जाए

संबल बन गया जीवन का -

तुम संग ये नाता पावन जीना !


बांधूं अमर प्रीत- बंध मन के

तुम संग नित नये ख्वाब सजाऊँ

रोज मनाऊँ तुम रूठो तो

पर तुमसे रूठना - कभी ना चाहूं

फिर भी रहती -चाहत मन की

इक झूठमूठ की अनबन जीना !!!!!!!!

अगला लेख: नेह तुलिका --



ममता
03 दिसम्बर 2018

बीत ना मन का मौसम जाए -

चाहूं समय यहीं थम जाए ;

हों अटल ये पल -प्रणय के साथी -

भय है, टूट ना ये भ्रम जाए

संबल बन गया जीवन का -

तुम संग ये नाता पावन जीना !
बहुत ही प्यारी रचना | बधाई

रेणु
04 दिसम्बर 2018

धन्यवाद ममता जी | अभिनन्दन |

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