"मुक्तक"

06 नवम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (26 बार पढ़ा जा चुका है)

रूप चौदस/छोटी दीपावली की सभी को हार्दिक बधाई एवं मंगल शुभकामना


"मुक्तक"


जलाते दीप हैं मिलकर भगाने के लिए तामस।

बनाते बातियाँ हम सब जलाने के लिए तामस।

सजाते दीप मालिका दिखाने के लिए ताकत-

मगर अंधेर छुप जाती जिलाने के लिए तामस।।-1


विजय आसान कब होती खुली तलवार चलती है।

फिजाओं की तपिश लेकर गली तकरार पलती है।

सुहानी रात की खातिर दिवस बरबाद होता है-

भली यह दीप-मालिका कली अनुसार खिलती है।।-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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महातम मिश्रा
10 नवम्बर 2018

हार्दिक धन्यवाद बहन, आज मेल देखा , पंच पर्व की बहुत बहुत बधाई पूरे परिवार को, शुभाशीष बहना

रेणु
07 नवम्बर 2018

आदरणीय भैया | -- मुक्तक बहुत ही प्यारा है हमेशा की तरह आपकी मौलिक पहचान लिए | आपको दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनायें स्वीकार हों | सपरिवार सकुशल रहें मेरी यही कामना हैं | आपको मेल भी किया था पर शायद आप मेल देखते नही | सादर प्रणाम |

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"मुक्तक"सत्य समर्पित है सदा, लेकर मानक मान।जगह कहाँ कोई बची, जहाँ नहीं गुणगान।झूठा भी चलता रहा, पाकर अपनी राह-झूठ-मूठ का सत्य कब, पाता है बहुमान।।-1सही अर्थ में देख लें, लाल रंग का खैर।झूठ सगा होता नहीं, और सगा नहीं गैर।सत्य कभी होती नहीं, आपस की तकरार-झूठ कान को भर गया, खूँट बढ़ा गया बैर।।-2महातम मि
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"पिरामिड"वो रीतिप्रतीतिपरंपराज्ञान अक्षरासकुचाती गईक्यों छोड़कर जाती।।-1वोशुद्धदीवालीप्रतिपालीजीवन शैलीबदलती ऋतुनव फूल खिले हैं।।-2महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
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आप का दिन मंगलमय हो,"मुक्तक"चढ़ा लिए तुम बाण धनुर्धर, अभी धरा हरियाली है।इंच इंच पर उगे धुरंधर, किसने की रखवाली है।मुंड लिए माँ काली दौड़ी, शिव की महिमा न्यारी है-नित्य प्रचंड विक्षिप्त समंदर, गुफा गुफा विकराली है।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
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वज़्न-- 1222 1222 122 अर्कान-- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन, क़ाफ़िया— वास्ता (आ स्वर की बंदिश) रदीफ़ - है"गज़ल" कहो जी आप से क्या वास्ता हैसुनाओ क्या हुआ कुछ हादसा हैसमझ लेकर बता देना मुझे भीहुआ क्या बंद प्रचलित रास्ता है।।चले जा चुप भली चलती डगर येमना लेना नयन दिग फरिश्ता है
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