"मुक्तक"

14 नवम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (78 बार पढ़ा जा चुका है)

बाल-दिवस पर प्रस्तुति


"मुक्तक"


काश आज मन बच्चा होता खूब मनाता बाल दिवस।

पटरी लेकर पढ़ने जाता और नहाता ताल दिवस।

राह खेत के फूले सरसों चना मटर विच खो जाता-

बूढ़ी दादी के आँचल में सुध-बुध देता डाल दिवस।।-1


गैया के पीछे लग जाता बन बछवा की चाल दिवस।

तितली के पर को रंग देता हो जाता खुशहाल दिवस।

बिना भार के गुरु शरण में वीणा की पूजा करता-

ज्ञान और विज्ञान धरोहर धर लेता निकाल दिवस।।-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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महातम मिश्रा
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रचना को विशिष्ठ सूची में स्थान देने के लिए हृदय से मंच, मित्रों का आभारी हूँ

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शिल्प विधान- ज र ज र ज ग, मापनी- 121 212 121 212 121 2 वाचिक मापनी- 12 12 12 12 12 12 12 12."छंद पंचचामर"सुकोमली सुहागिनी प्रिया पुकारती रही।अनामिका विहारिणी हिया विचारती रही।।सुगंध ले खिली हुई कली निहारती रही।दुलारती रही निशा दिशा सँवारती रही।।-1बहार बाग मोरिनी कुलांच मारती रही।मतंग मंद मालती सुगंध
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छंद - चामर, शिल्प विधान- र ज र ज र, मापनी - 212 121 212 121 212 वाचिक मापनी - 21 21 21 21 21 21 21 2 "चामर छंद"राम- राम बोलिए जुबान मीठ पाइकै।गीत- मीत गाइए सुराज देश लाइकै।।संग- संग नाव के सवार बैठ जाइए।आर- पार सामने किनार देख आइए।।द्वंद बंद हों सभी बहार बाग छाइयै।फूल औ कली हँसें मुखार बिंदु पाइयै।
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