जीवन और परम्परा

16 नवम्बर 2018   |  उदय पूना   (37 बार पढ़ा जा चुका है)

जीवन और परम्परा


परम्परा होती है परम्परा, जीवन नहीं;

परम्परा होती है जीवन केलिए, परम्परा केलिए जीवन नहीं;


जीवन प्रथम है परम्परा नहीं;

जो परम्परा जीवन विरोधी हो जाए उसको कभी मानना नहीं;

समय में पीछे झांक कर देखें,

परम्परा न बदले, ऐसा युग अभी तक आया नहीं;


नियम-क़ानून और जीवन में इसी तरह की प्राथमिकता का अंतर है;

सामूहिक जीवन की सुविधा केलिए नियम-क़ानून बनाये जाते हैं;

सामूहिक जीवन प्रथम है, नियम-क़ानून नहीं;


यदि उनके कारण सामूहिक जीवन में असुविधा होने लगे;

वांछनीय उद्देश्य प्राप्ति में अड़चन होने लगे;

तो नियम-क़ानून को बदल देते हैं, सामूहिक जीवन को नहीं;


उदय पूना

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