मैं कट्टर नहीं हूं

18 नवम्बर 2018   |  उदय पूना   (37 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं कट्टर नहीं हूं


स्वयं को भारतीय कहना, मानव कहना कट्टरता नहीं है;

अपनी जड़ों से जुड़े रहना;

जो समूचे विश्व को एक माने, एक कुटम्ब माने, ऐसी जड़ों से जुड़े रहना कट्टरता नहीं है


सबको अपना समझना;

स्वयं को सबका समझना;

सबको - हर किसीको, स्वीकार करना;

सबको साथ लेकर चलना;

विविधता को वांछनीय मानना, स्वीकार करना कट्टरता नहीं है


यदि हमने कट्टरता नहीं पहचानी, तो हमारी अयोग्यता अवश्य है;

यदि हमने कट्टरता की प्रवृत्ति को नहीं दबाया;

यदि हम उससे न निपटें, न निपट सकें तो हमारी कायरता अवश्य है


क्या हम मूढ़ हैं ? फिर क्यों मूढ़ता करते हैं ?

भेद कर सकते हैं, कट्टरता की, आतंकवाद की पहचान कर सकते हैं, फिर क्यों नहीं करते हैं ?

मानवता केलिए है जो सबसे बड़ा खतरा, उसकी काट क्यों नहीं करते हैं ?

इसको मिटाने केलिए एक जुट क्यों नहीं हुआ करते हैं;

क्या हम मूर्ख हैं ? क्या हम पागल हैं ?

इस तरह से सोचना, इस पर विचार करना और अपनी गलती को सुधारना कट्टरता नहीं है


विश्व में मानवता बनी रहे, इसके लिए कार्य करना;

और अमानवीय शक्तियों को हराना, घटाना;

मानवता सत्ता में रहे, और अमानवीयता सत्ता से बाहर रहे, इसके लिए कार्य करना कट्टरता नहीं है


हमारे अंदर कट्टरता और आतंकवाद नहीं है;

हमारे जीवन में, जीवन मूल्यों में, सिद्धांतों और आधार में इनके लिए कोई स्थान नहीं है;

जो विचार धारा, जो सिद्धांत, जो जीवन शैली कट्टरता समर्थक है, और मानवता विरोधी है ;

उसका विरोध करना, अमानवीयता के विरुद्ध प्रतिरोध बढ़ाना कट्टरता नहीं है


स्वयं को भारतीय कहना, मानव कहना कट्टरता नहीं है


भारत मां के विरुद्ध बाहर से आक्रमण, अंदर से हो रहे आक्रमण;

न देख पाना, देख कर अनदेखा कर देना;

जीवन की सबसे बड़ी चूक अवश्य है, जीवन का सब से बड़ा अपराध अवश्य है

स्वयं की शक्ति बढ़ाना, रक्षा करना प्रथम आवश्यकता है;

इस केलिए जागरूक रहना, कार्य करना कट्टरता नहीं है, आतंकवाद नहीं है


जब ईश्वर को मानते हैं, जब मानते हैं ईश्वर ने दुनिया बनाई है;

फिर पूरी दुनिया को अपना क्यों मानते नहीं


दुनिया को एक ही रंग में रंगने केलिए पागलपन क्यों पालते हैं;

जब ना ना प्रकार के रंग ईश्वर ने दुनिया में भरे हैं;

फिर विविधता क्यों स्वीकारते नहीं


प्रत्येक का जीवन जीवन है, समूचा विश्व प्रत्येक का है;

प्रत्येक को अपने ढंग से जीने का अधिकार है


जो सिद्धांत सबके लिए नहीं, जिससे सबका भला नहीं;

जिसे में सबके हित, और बराबरी की स्वीकृति नहीं;

जिसमें प्रत्येक केलिए अच्छे से जीवन जीने की स्वीकृति नहीं;

प्रत्येक को अपने ढंग से, अपने निज ढंग से जीने का अधिकार नहीं;

इस तरह की किसी बात को बिलकुल मानना नहीं

उनको समाज का, जीवन जीने का आधार बनाना नहीं;

इस तरह के सिद्धांत आदि का विरोध करना कट्टरता नहीं, आतंकवाद नहीं


स्वयं को भारतीय कहने में, मानव कहने में किसी भी प्रकार की कट्टरता नहीं;

स्वयं की रक्षा करने में, स्वयं की रक्षा के उपाय करने में किसी भी प्रकार का आतंकवाद नहीं


उदय पूना


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