ऐतराज़...

19 नवम्बर 2018   |  Harshad kalidas molishree   (12 बार पढ़ा जा चुका है)

ऐतराज़...  - शब्द (shabd.in)

ऐतराज़...

एक दौर है ये जहाँ तन्हां रात में वक़्त कट्टा नही... वो भी एक दौर था जहाँ वक़्त की सुईयों को पकड़ू तो वक़्त ठहरता नही... एक दौर है ये जहाँ नजर अंदाज शौक से कर दिए जाते है... वो भी एक दौर था... जहाँ चुपके चुपके आँखों मैं मीचे जाते थे... एक दौर है ये जहाँ आंसू बहते हुए आँखों में सुख जाते है.... वो भी एक दौर था... जहाँ हसी के कारण आंसुओं को थामना मुश्किल था.... एक दौर है ये जहां बातें किस्से कहें इसड बात पे गम करते है... वो भी एक दौर था जहां बातें करते करते अधूरी न रह जाये इस बात का डर था.... एक दौर था वो एक दौर था... जहाँसिर्फ प्यार नही मगर झगड़े भी होते थे... जहाँ सिर्फ तकरार नही प्यार के मीठे लफ्ज़ भी बोते थे... जहाँ सिर्फ सिसकियाँ नही हसी के तहाँके भी होते थे.... ये दौर भी आज ये दौर है जहां सिसकियों मैं झीनी आँखें है... जहाँ लफ़्ज़ों में अब भी वक़्त की डोर है... जहाँ यादों में अब भी प्यार की मिठास है... जहाँ गम में भी उनके खुश होने का एहसास है... जहां सब खोने के बाद भी क्यों जिंदा है इस बात पे ऐतराज़ है....

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