महादेवी वर्मा की 11 प्रसिद्ध कवितायेँ - Mahadevi verma poems in hindi

21 नवम्बर 2018   |  अंकिशा मिश्रा   (559 बार पढ़ा जा चुका है)

महादेवी वर्मा की 11 प्रसिद्ध कवितायेँ - Mahadevi verma poems in hindi

हिंदी साहित्य जगत की मीरा कही जाने वाली महान लेखिका महादेवी वर्मा का साहित्य जगत में उसी प्रकार से नाम है जैसे कि मुंशी प्रेमचंद व अन्य साहित्यकारों का। उनकी कवितायेँ और निबंध (mahadevi verma poems ) हमेशा से मनुष्य को एक नयी राह दिखाती रहीं हैं| महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तम्भों में से एक हैं | महादेवी वर्मा ने अपनी रचनाओं से रूढ़वादी सोच को ख़त्म किया है, और महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है |



कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है | पूरा जीवन एक संन्यासी की तरह बिताने वालीं महादेवी वर्मा को 1988 में पद्मविभूषण से अलंकृत किया गया था। महादेवी वर्मा कोमल भावनाओं की संवाहक थीं। सात वर्ष की अवस्था में उन्होंने पहली कविता लिखी थी− "आओ प्यारे, तारे आओ मेरे आंग में बिछ जाओ।"


महादेवी वर्मा की 11 प्रसिद्ध कवितायेँ - Mahadevi verma poems in hindi


अधिकार

वे मुस्काते फूल, नहीं

जिनको आता है मुर्झाना,

वे तारों के दीप, नहीं

जिनको भाता है बुझ जाना;

वे नीलम के मेघ, नहीं

जिनको है घुल जाने की चाह

वह अनन्त रितुराज,नहीं

जिसने देखी जाने की राह|

वे सूने से नयन,नहीं

जिनमें बनते आँसू मोती,

वह प्राणों की सेज,नही

जिसमें बेसुध पीड़ा सोती;

ऐसा तेरा लोक, वेदना

नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,

जलना जाना नहीं, नहीं

जिसने जाना मिटने का स्वाद!

क्या अमरों का लोक मिलेगा

तेरी करुणा का उपहार?

रहने दो हे देव! अरे

यह मेरा मिटने का अधिकार!


तितली से

मेह बरसने वाला है

मेरी खिड़की में आ जा तितली।

बाहर जब पर होंगे गीले,

धुल जाएँगे रंग सजीले,

झड़ जाएगा फूल, न तुझको

बचा सकेगा छोटी तितली,

खिड़की में तू आ जा तितली!

नन्हे तुझे पकड़ पाएगा,

डिब्बी में रख ले जाएगा,

फिर किताब में चिपकाएगा

मर जाएगी तब तू तितली,

खिड़की में तू छिप जा तितली।



मिटने का अधिकार

वे मुस्काते फूल, नहीं

जिनको आता है मुरझाना,

वे तारों के दीप, नहीं

जिनको भाता है बुझ जाना

वे सूने से नयन,नहीं

जिनमें बनते आँसू मोती,

वह प्राणों की सेज,नही

जिसमें बेसुध पीड़ा, सोती

वे नीलम के मेघ, नहीं

जिनको है घुल जाने की चाह

वह अनन्त रितुराज,नहीं

जिसने देखी जाने की राह

ऎसा तेरा लोक, वेदना

नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,

जलना जाना नहीं, नहीं

जिसने जाना मिटने का स्वाद!

क्या अमरों का लोक मिलेगा

तेरी करुणा का उपहार

रहने दो हे देव! अरे

यह मेरे मिटने क अधिकार!

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!

युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल

प्रियतम का पथ आलोकित कर!

सौरभ फैला विपुल धूप बन

मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन!

दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,

तेरे जीवन का अणु गल-गल

पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!

तारे शीतल कोमल नूतन

माँग रहे तुझसे ज्वाला कण;

विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं

हाय, न जल पाया तुझमें मिल!

सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!

जलते नभ में देख असंख्यक

स्नेह-हीन नित कितने दीपक

जलमय सागर का उर जलता;

विद्युत ले घिरता है बादल!

विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!

द्रुम के अंग हरित कोमलतम

ज्वाला को करते हृदयंगम

वसुधा के जड़ अन्तर में भी

बन्दी है तापों की हलचल;

बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!

मेरे निस्वासों से द्रुततर,

सुभग न तू बुझने का भय कर।

मैं अंचल की ओट किये हूँ!

अपनी मृदु पलकों से चंचल

सहज-सहज मेरे दीपक जल!

सीमा ही लघुता का बन्धन

है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन

मैं दृग के अक्षय कोषों से-

तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!

सहज-सहज मेरे दीपक जल!

तुम असीम तेरा प्रकाश चिर

खेलेंगे नव खेल निरन्तर,

तम के अणु-अणु में विद्युत-सा

अमिट चित्र अंकित करता चल,

सरल-सरल मेरे दीपक जल!

तू जल-जल जितना होता क्षय;

यह समीप आता छलनामय;

मधुर मिलन में मिट जाना तू

उसकी उज्जवल स्मित में घुल खिल!

मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!

प्रियतम का पथ आलोकित कर!


जाने किस जीवन की सुधि ले

जाने किस जीवन की सुधि ले

लहराती आती मधु-बयार!

रंजित कर ले यह शिथिल चरण, ले नव अशोक का अरुण राग,

मेरे मण्डन को आज मधुर, ला रजनीगन्धा का पराग;

यूथी की मीलित कलियों से

अलि, दे मेरी कबरी सँवार।

पाटल के सुरभित रंगों से रँग दे हिम-सा उज्जवल दुकूल,

गूँथ दे रशमा में अलि-गुंजन से पूरित झरते बकुल-फूल;

रजनी से अंजन माँग सजनि,

दे मेरे अलसित नयन सार !

तारक-लोचन से सींच सींच नभ करता रज को विरज आज,

बरसाता पथ में हरसिंगार केशर से चर्चित सुमन-लाज;

कंटकित रसालों पर उठता

है पागल पिक मुझको पुकार!

लहराती आती मधु-बयार !!


बया हमारी चिड़िया रानी

बया हमारी चिड़िया रानी!

तिनके लाकर महल बनाती,

ऊँची डाली पर लटकाती,

खेतों से फिर दाना लाती,

नदियों से भर लाती पानी।

तुझको दूर न जाने देंगे,

दानों से आँगन भर देंगे,

और हौज़ में भर देंगे हम-

मीठा-मीठा ठंडा पानी।

फिर अंडे सेयेगी तू जब,

निकलेंगे नन्हे बच्चे तब,

हम आकर बारी-बारी से

कर लेंगे उनकी निगरानी।

फिर जब उनके पर निकलेंगे,

उड़ जाएँगे बया बनेंगे,

हम तब तेरे पास रहेंगे,

तू मत रोना चिड़िया रानी

जीवन दीप

किन उपकरणों का दीपक,

किसका जलता है तेल?

किसकी वर्त्ति, कौन करता

इसका ज्वाला से मेल?

शून्य काल के पुलिनों पर-

जाकर चुपके से मौन,

इसे बहा जाता लहरों में

वह रहस्यमय कौन?

कुहरे सा धुँधला भविष्य है,

है अतीत तम घोर ;

कौन बता देगा जाता यह

किस असीम की ओर?

पावस की निशि में जुगनू का-

ज्यों आलोक-प्रसार।

इस आभा में लगता तम का

और गहन विस्तार।

इन उत्ताल तरंगों पर सह-

झंझा के आघात,

जलना ही रहस्य है बुझना –

है नैसर्गिक बात !


क्या पूजन क्या अर्चन रे!

क्या पूजन क्या अर्चन रे!

उस असीम का सुंदर मंदिर मेरा लघुतम जीवन रे!

मेरी श्वासें करती रहतीं नित प्रिय का अभिनंदन रे!

पद रज को धोने उमड़े आते लोचन में जल कण रे!

अक्षत पुलकित रोम मधुर मेरी पीड़ा का चंदन रे!

स्नेह भरा जलता है झिलमिल मेरा यह दीपक मन रे!

मेरे दृग के तारक में नव उत्पल का उन्मीलन रे!

धूप बने उड़ते जाते हैं प्रतिपल मेरे स्पंदन रे!

प्रिय प्रिय जपते अधर ताल देता पलकों का नर्तन रे!


ठाकुर जी भोले हैं

ठंडे पानी से नहलातीं,

ठंडा चंदन इन्हें लगातीं,

इनका भोग हमें दे जातीं,

फिर भी कभी नहीं बोले हैं।

माँ के ठाकुर जी भोले हैं।

उर तिमिरमय घर तिमिरमय

उर तिमिरमय घर तिमिरमय

चल सजनि दीपक बार ले!

राह में रो रो गये हैं

रात और विहान तेरे

काँच से टूटे पड़े यह

स्वप्न, भूलें, मान तेरे;

फूलप्रिय पथ शूलमय

पलकें बिछा सुकुमार ले!

तृषित जीवन में घिर घन-

बन; उड़े जो श्वास उर से;

पलक-सीपी में हुए मुक्ता

सुकोमल और बरसे;

मिट रहे नित धूलि में

तू गूँथ इनका हार ले !

मिलन वेला में अलस तू

सो गयी कुछ जाग कर जब,

फिर गया वह, स्वप्न में

मुस्कान अपनी आँक कर तब।

आ रही प्रतिध्वनि वही फिर

नींद का उपहार ले !

चल सजनि दीपक बार ले !


मैं नीर भरी दुःख की बदली

मैं नीर भरी दुःख की बदली,

स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,

क्रंदन में आहत विश्व हँसा,

नयनो में दीपक से जलते,

पलकों में निर्झनी मचली !

मैं नीर भरी दुःख की बदली !

मेरा पग पग संगीत भरा,

श्वांसों में स्वप्न पराग झरा,

नभ के नव रंग बुनते दुकूल,

छाया में मलय बयार पली !

मैं नीर भरी दुःख की बदली !

मैं क्षितिज भृकुटी पर घिर धूमिल,

चिंता का भर बनी अविरल,

रज कण पर जल कण हो बरसी,

नव जीवन अंकुर बन निकली !

मैं नीर भरी दुःख की बदली !

पथ न मलिन करते आना

पद चिन्ह न दे जाते आना

सुधि मेरे आगम की जग में

सुख की सिहरन हो अंत खिली !

मैं नीर भरी दुःख की बदली !

विस्तृत नभ का कोई कोना

मेरा न कभी अपना होना

परिचय इतना इतिहास यही

उमटी कल थी मिट आज चली !

मैं नीर भरी दुःख की बदली !



महादेवी वर्मा की अन्य कविताओं को यहाँ पढ़े ......

पूछता क्यों शेष कितनी रात?
मैं नीर भरी दु:ख की बदली!


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