नदी तुम माँ क्यों हो...?

22 नवम्बर 2018   |  रवीन्द्र सिंह यादव   (61 बार पढ़ा जा चुका है)

नदी तुम माँ क्यों हो...?


सभ्यता की वाहक क्यों हो...?


आज ज़ार-ज़ार रोती क्यों हो...?


बात पुराने ज़माने की है


जब


गूगल


जीपीएस


स्मार्ट फोन


कृत्रिम उपग्रह


पृथ्वी के नक़्शे


दिशासूचक यंत्र


आदि नहीं थे


एक आदमी


अपने झुण्ड से


जंगल की भूलभुलैया-सी


पगडंडियों पर चलते-चलते


पैर की नस दबने / चढ़ने / तड़कने से


भटककर छिटककर बिछड़ गया


घिसटते-घिसटते


अग्रसर हुआ


ऊँचे टीले से


साथियों को


आवाज़ लगायी


कोई सदा लौट के आयी


बस प्रतिध्वनि ही


निराश लौट आयी


सुदूर क्षितिज तक


व्याकुल थकी नज़र दौड़ायी


घने वृक्षों के बीच


नीलिमा नज़र आयी


जीने की आस जागी


आँखों में रौशनी जगमगायी


हिम्मत करके उतरा


ऊँघती कटीली घाटियों में


चला सुनसान वन में


उस नीलिमा की ओर


दर्द सहते-सहते हौले-हौले


पैर को जकड़ा


नर्म वन लताओं से


रास्ता तय किया


एक टीला और मिला


अब एक नदी नमूदार हुई


चलते-चलते तन से


निचुड़ा पानी


प्यासे को लगा


ख़त्म हो जायेगी कहानी


बढ़ती प्यास ने


दर्द विस्मित किया


प्यासे और नदी के बीच


दूरी न्यूनतर होती गयी


नदी से कुछ ही दूरी पर


मूर्छा आने लगी


पाकर नदी का किनारा


राहत की साँसें भी भारी हुईं


तपती रेत में


बोझिल क़दमों से


प्यासा चला


उभरे पाँवों में


छालों ने छला


अब नदी का पानी


कुछ ही क़दम दूर था


पाँवों में प्यासे को


ठंडक महसूस हुई


लगा ज्यों माँ ने


लू लगने पर


तलवों में बकरी का दूध


और प्याज़ का रस मला हो


नस तड़की और


गिर पड़ा औंधे मुँह


चरम पर थी प्यास और पीर


बस दो हाथ की दूरी पर था


कल-कल करता बहता


नदिया का निर्मल नीर


जलपक्षी जलक्रीड़ा में थे मग्न


बह रही थी तपिश में


राहतभरी शीतल पवन


घिसटकर पानी तक


पहुँचने की हिम्मत रही


एक लहर आयी


मुँह को छुआ


लगा जैसे माँ ने


पिलाया हो पानी


लगाकर ओक


जीवन तरंगित हुआ


बिखरा जीवन आलोक


बैठकर जीभर पानी पिया


जिजीबिषा जीत गयी


पाकर क़ुदरत का वरदहस्त


प्यास बुझाकर प्यासे ने


नदी को माँ कहकर


श्रद्धा से सम्बोधित किया


साधुवाद दिया


यह ममता बढ़ती रही


कालान्तर में


आस्था हो गयी


इंसान ने नदी को


माँ जैसा मान-सम्मान


देने का विचार दिया


परम्पराओं-वर्जनाओं का


रोपड़-अनुमोदन किया


नदियों के किनारे


सभ्यताओं ने


पैर पसारने का


अनुकूल निर्णय लिया


जीवनदायिनी नदिया का


आज हमने क्या हाल किया है?


समाज का सारा कल्मष


नदियों में उढ़ेल दिया!


क्या फ़ाएदा


इस ज्ञान-विज्ञान


आधुनिक तकनीक


सभ्य समाज की


तथाकथित समझदारी का!


जिसने इंसान को


प्रकृति की गोद से


जबरन अलहदा किया!!


© रवीन्द्र सिंह यादव


अगला लेख: Common Sense



रेणु
23 नवम्बर 2018

आदरणीय रवीन्द्र जी -- नदी को ये कविमन का उद्बोधन बहुत ही भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी है | सच कहूँ तो इसके भीतर व्याप्त कथा मुझे भीतर तक छू गई | एक तृषित व्यक्ति ने जब नदी में माँ सा ममत्व पाया तो उसके भावविहल मन से उमड़े - एक संबोधन ' माँ ; ने हमेशा के लिए मानव और नदी का अटूट रिश्ता बना दिया | पर नदी कब माँ न थी ? हर नदी ने अनगिन जीवों को पोषित किया है | संस्कृतियों और सभ्यताओं को विस्तार दिया है | इसके तट उतने ही सुरक्षित थे जैसे माँ का आंचल | जलचर, नभचर और थलचर तीनों के लिए वरदान रही नदियों के मूल रूप से खिलवाड़ कर उसे कुरूप और रुष्ट कर दिया इस भौतिकवाद ने | उसके चिंघाड़ते स्वर और टूटते तटबंध उसके आक्रांत मन की अनकही वेदना हैं | जनकल्याणी ये जल धाराएँ अपना अस्तित्व खोटी अपनी बदहाली परर आसूं बहा रही हैं | इस भावपूर्ण सृजन के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनायें | बहुत अच्छा लिखा आपने |

सादर आभार आदरणीया रेणु जी रचना की विस्तृत व्याख्या के लिये.

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x