"कुंडलिया"

22 नवम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (72 बार पढ़ा जा चुका है)

"कुंडलिया"


"कुंडलिया"


अच्छे लगते तुम सनम यथा कागजी फूल।

रूप-रंग गुलमुहर सा, डाली भी अनुकूल।।

डाली भी अनुकूल, शूल कलियाँ क्यों देते।

बना-बनाकर गुच्छ, भेंट क्योंकर कर लेते।।

कह गौतम कविराय, हक़ीकत के तुम कच्चे।

हो जाते गुमराह, देखकर कागज अच्छे।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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