मैं भटकता रहा

25 नवम्बर 2018   |  उदय पूना   (47 बार पढ़ा जा चुका है)


*गहराई की छिपी वर्जनाओं के स्वर*
( "स्वयं पर स्वयं" से )


मैं भटकता रहा


मैं भटकता रहा;
समय, यूं ही निकलता रहा;

मैं भटकता रहा।


उथला जीवन जीता रहा;
तंग हाथ किये, जीवन जीता रहा।


न किसी को, दिल खोल कर अपना सका;
न किसी का, खुला दिल स्वीकार कर सका;
न आपस की, दूरी मिटा सका;
न सब कुछ दे सका, न सब कुछ ले सका;


अच्छा सम्बन्ध तो बहुत चाहा;
पर कीमत चुकाने से, बचता रहा, डरता रहा;
स्वयं को मिटा देने से बचता रहा, डरता रहा।।

मैं भटकता रहा;
समय, यूं ही निकलता रहा;

मैं भटकता रहा।

उदय जैन, पूना
9284737432,

.............................

*गहराई छिपे स्वर*
( "स्वयं पर स्वयं" से )


मैं भटकता रहा;
समय, यूं ही निकलता रहा;

मैं भटकता रहा।


न खुल कर, जीवन में कुछ कर सका;
न खुल कर, जीवन जी सका;
न खुल कर, जीवन से भाग सका;


विद्रोह, करना तो बहुत चाहा;
पर कीमत चुकाने से, बचता रहा, डरता रहा;
स्वयं को मिटा देने से बचता रहा, डरता रहा;


मैं भटकता रहा;
समय, यूं ही निकलता रहा;

मैं भटकता रहा।


उदय जैन, पूना
9284737432

. . , , * * , , ..


यह किस्सा है मेरे जीवन का;
जानता हूं, यही किस्सा है अनेकों का;

हम इतना तो जानलें कि मैं स्वयं को जानता नहीं;
मैं स्वयं से जुड़ा नहीं;
मैं वास्तविकता से जुड़ा नहीं;
क्या करना है जानता नहीं;

मैं कुछा भी करता रहा;
मेरे जीवन में कुछ भी होता रहा;

मैं भटकता रहा;
समय, यूं ही निकलता रहा;

Uday Poona

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