जावेद अख़्तर - बहाना ढूंढते रहते हैं कोई रोने का Poem in Hindi

26 नवम्बर 2018   |  अंकिशा मिश्रा   (404 बार पढ़ा जा चुका है)

जावेद अख़्तर - बहाना ढूंढते रहते हैं कोई रोने का Poem in Hindi

बहाना ढूंढते रहते हैं कोई रोने का - जावेद अख़्तर Poem in Hindi


बहाना ढूंढ़ते रहते हैं कोई रोने का


बहाना ढूंढ़ते रहते हैं कोई रोने का

हमें ये शौक़ है क्या आस्तीन भिगोने का


अगर पलक पर है मोती तो ये नहीं काफ़ी

हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का


जो फसल ख़्वाब की तैयार है तो ये जानो

कि वक़्त आ गया फिर दर्द कोई बोने का


ये ज़िंदगी भी अजब कारोबार है

कि मुझे ख़ुशी है पाने की कोई न रंज खोने का


है चकनाचूर मगर फिर भी मुस्कुराता है

वो चेहरा जैसे हो टूटे हुए खिलौने का

बहाना ढूंढते रहते हैं कोई रोने का - जावेद अख़्तर Poem in Hindi


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