निदा फ़ाज़ली -नयी-नयी आँखें In Hindi

27 नवम्बर 2018   |  अंकिशा मिश्रा   (70 बार पढ़ा जा चुका है)

निदा फ़ाज़ली -नयी-नयी आँखें  In Hindi

Hindi poem -Nida Fazli


नयी-नयी आँखें


नयी-नयी आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है

कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन, अब घर अच्छा लगता है ।


मिलने-जुलनेवालों में तो सारे अपने जैसे हैं

जिससे अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है ।


मेरे आँगन में आये या तेरे सर पर चोट लगे

सन्नाटों में बोलनेवाला पत्थर अच्छा लगता है ।


चाहत हो या पूजा सबके अपने-अपने साँचे हैं

जो मूरत में ढल जाये वो पैकर अच्छा लगता है ।


हमने भी सोकर देखा है नये-पुराने शहरों में

जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है ।


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