सुनहरी शाम

28 नवम्बर 2018   |  महेश कुमार बोस   (41 बार पढ़ा जा चुका है)

सुनहरी शाम  - शब्द (shabd.in)

ये सुनहरी शाम और ये जाती हुयी सूरज की धूप,

कितना खूबसूरत लगता है प्रकृति का ये अनमोल रूप।


ये हवा की हसीन अदायें,

कितनी जंचती हैं ये वादियों पे फिजायें

ये कुदरत का नजारा मन मोह लेता है

राह चलते मुसाफिर के कदम,

निहारने के लिए रोक लेता है।


ये सूरज भी ना कितना इंतजार करवाता है,

मगर जब अपने घर वापस जाता है।

इस सुनहरी शाम की सौगात देकर जाता है,

ये पहर सबके मन को बहुत भाता है।


इस सुनहरी शाम के नजारे को कैद करने,

कोई छत पर, कोई नदी तट पर,

कोई पर्वत पर, कोई उद्यान में जाता है,

ये मनमोहक नजारा मन को असीम सुख दिलाता है।


महेश कुमार बोस

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रेणु
01 दिसम्बर 2018

अच्छी रचना के लिए आभार

उदय पूना
29 नवम्बर 2018

प्रिय महेश कुमार बोस, बधाई हो! आपकी कविता ' सुनहरी शाम' आज की सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में चयनित हुई है;
मन भावन रचना है;

धन्यवाद

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