दोराहा

28 नवम्बर 2018   |  उदय पूना   (33 बार पढ़ा जा चुका है)

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हर क्षण, नया क्षण, सदा साथ लाता है दोराहा


हर क्षण, नया क्षण, सदा साथ लाता है दोराहा;

भटकन से भरा, स्थायित्व से भरा होता है दोराहा।


जिसे जो राह चलना है, चुन ले, सब देता है दोराहा;

होश में रहें, साफ साफ देखें, सब से भरा होता है दोराहा।


भटकते ही रहना है तो, बाहर बाहर रहें सदा, यह अवसर भी देता दोराहा;

स्थायित्व की राह अंदर की ओर है, स्वयं से जुड़ने का अवसर भी देता दोराहा।


हर क्षण, नया क्षण, सदा साथ लाता है दोराहा।

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हर क्षण, नया क्षण, सदा साथ लाता है दोराहा;

हित से भरा, अहित से भरा होता है दोराहा।


हम स्वयं जो चाहें चयन कर लें, अवसर देता दोराहा;

हम स्वयं का हित चुने, अहित चुने, अवसर देता दोराहा।


हित, अहित को खण्ड खण्ड करें तो हम कह सकते हैं कि;


भटकन से भरा, स्थायित्व से भरा;

खुशी से भरा, उदासी से भरा;

शांति से भरा, अशांति से भरा;

उत्थान से भरा, पतन से भरा;

मुक्ति से भरा, बंधन से भरा;

आनंद से भरा, दुख परेशानी से भरा;

इस तरह की जोड़ियों से भरा होता है दोराहा।


हम स्वयं जो चाहें चयन कर लें, अवसर देता दोराहा;

हम स्वयं का हित चुने, अहित चुने, अवसर देता दोराहा।


हर क्षण, नया क्षण, सदा साथ लाता है दोराहा।

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हम हर क्षण स्वयं का हित चुने, क्यों करें मन का चाहा;

हम विचारें, क्या होता है जब हम करतें हैं मन का चाहा।


सचेत रहें, तैयार रहें, हित चुनते रहें, यह सतत क्रिया है;

क्योंकि हर क्षण में सदा छिपा रहता है दोराहा;

हम सदा चुनेंगे हित, क्या हुआ जो हर क्षण में छिपा रहता है दोराहा।


हर क्षण, नया क्षण, सदा साथ लाता है दोराहा;

हर क्षण, नया क्षण, सदा साथ लाता है दोराहा।


उदय पूना

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