"मुक्तक,"

30 नवम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (82 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्तक"


हार-जीत के द्वंद में, लड़ते मनुज अनेक।

किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।

बर्छी भाला फेंक दो, विषधर हुई उड़ान-

पीड़ा सतत सता रहीं, छोड़ो युद्ध विवेक।।-1


हार-जीत किसको फली, ऊसर हुई जमीन।

युग बीता विश्वास का, साथी हुआ मशीन।

बटन सटन दुख दर्द को, लगा न देना हाथ-

यंत्र- यंत्र में तार है, जुड़ते जान नगीन।।-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी


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महातम मिश्रा
02 दिसम्बर 2018

रचना को विशिष्ट श्रेणी का सम्मान प्रदान करने के लिए मंच का हृदय से आभारी हूँ

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