मुक्तक

02 दिसम्बर 2018   |  अजय चतुर्वेदी कक्का   (5 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं नहीं कहता कि सर्वस वर दूंगा। कदमों में तेरे चाँद-सूरज डाल दूंगा। कल्पना जितनी किया होगा प्रिये, उससे अधिक 'कक्का' मैं तुमको प्यार दूंगा।

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