कौन सा पतझड़ मिले

02 दिसम्बर 2018   |  विजय कुमार तिवारी   (25 बार पढ़ा जा चुका है)

गीत
कौन सा पतझड़ मिले?
विजय कुमार तिवारी

और गा लूँ जिन्दगी की धून पर,
कल न जाने प्रीति को मंजिल मिले?

दर्द में उत्साह लेकर बढ़ रहा था रात-दिन,
आह में संगीत संचय कर रहा था रात-दिन।
आज सावन कह रहा है बार-बार,
क्यों लिया बंधन स्व-मन से रात-दिन?

सोचता हूँ चुम लूँ वह पंखुड़ी,
कल न जाने कौन सी बेकल खिले?

आपदाओं में पला तनहाईयों का शबाब है,
बीच कांटों में खिला कोई नया गुलाब है।
ईश्क में डुबी हुई यह जिन्दगी,
प्रेम-परिणत की व्यथा की खुली हुई किताब है।

देख लूँ मैं पल्ल्वों की लालिमा
कल न जाने कौन सा पतझड़ मिले?

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रेणु
15 दिसम्बर 2018

अच्छी रचनाहै आदरनीय विजय जी | जीवन में पतझड़ ना जाने कब अ जाए सो जो ख़ुशी के पल मिलते हैं वही जी लेने चाहिए | साभार --

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