खिड़की

03 दिसम्बर 2018   |  पंकज त्रिवेदी   (35 बार पढ़ा जा चुका है)

जब भी

खुलती है खिड़की

दिखता है तेरा चेहरा

और

हवा की लहर दौड़ आती है और

उन पर सवार आँगन के तुलसी की

ताज़गी...... और

गुलाब की पत्तियों की खुशबू...

उसके गुलाबी रंगों पर बिखरी हुई धूप से उभरती चमक

प्रफुल्लता की सारगर्भित सोच

और

नई दिशाएं खोलती है ये खिड़की

जब भी खुलती है...

तेरा चेहरा दिखता है और

खिड़की खुलती है तो भी -

शायद तुम नहीं कि कल्पना से ही

मेरी डायरी के पन्ने

पीले पड़ने लगते है...

जैसे की पतझड़... !

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ममता
06 दिसम्बर 2018

सर जी बहुत अच्छी रचना है | बहुत ख़ुशी हुई | हमें लिखना नहीं आता | बस पढ़ते हैं

उदय पूना
05 दिसम्बर 2018

बात है आपकी रचना में, आकर्षित कर पकड़ कर रखती है; बधाई, प्रणाम

पंकज त्रिवेदी
06 दिसम्बर 2018

आदरणीय उदय पूना जी, आपकी सहृदयता को सलाम

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