मरा जा रहा हूँ

04 दिसम्बर 2018   |  संजीव शुक्ल "सचिन"   (14 बार पढ़ा जा चुका है)

""""" """""मरा जा रहा हूँ (हास्य)""""" """' ************************* प्रिय मुझसे तेरा यूँ मुंह का फुलाना, नखरे दिखाना यूँ रूठ के सो जाना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। न हँसना तनिक भी न सजना सवरना, न आँखें दिखाना न लड़ना झगड़ना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। ओ तिरछी नजर से न मुझको रिझाना, न कसमों के ढाल को चलाना फसाना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। ओ उंगली के पोरों पर हमको नचाना, न पीहर के डर से हमें वो डराना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। ना गहनें न साड़ी न लहंगा को कहना, यूँ गुमसुम हमेशा मेरे संग रहना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। तेरा हक से मुझपे वो चिखना चिल्लाना, ना कॉफी पिलाना, न गले से लगाना, गजब ढा रहा है, गजब ढा रहा है। न पिक्चर को जाना,न शापिंग ही जाना, सनम अब बता तुझको कैसे मनाना? मरा जा रहा हूँ , मरा जा रहा हूँ, यूँ हमसे न रूठो , मरा जा रहा हूँ। ********** स्वरचित, स्वप्रमाणित ✍ ✍ पं.संजीव शुक्ल ” सचिन” मुसहरवा (मंशानगर) पश्चिमी चम्पारण (बिहार)

अगला लेख: Common Sense



इसमें कहां हंसना था कृपया मार्गदर्शन

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x