हुनर

09 दिसम्बर 2018   |  शिशिर मधुकर   (98 बार पढ़ा जा चुका है)

हुनर

कोई नाता है जन्मों का, तभी तो याद आती है

तेरी हर चीज़ यूँ ही थोड़े, मेरे मन को लुभाती है


मेरे खूं का हर इक कतरा, खुशी में झूम उठता है

मुझे आवाज़ दे और मुस्कान दे, जब तू बुलाती है

जब भी आगोश में भर के, तूने मस्तक ये चूमा है

हजारों फूल खिलते हैं, गीत धड़कन भी गाती है


तेरी हालत की तू जाने, मैं तो अपनी बताता हूँ

तेरी खुशबू मेरी सांसों में बस, मुझको सताती है


मुझे भी वो हुनर दे दे, जो तेरे पास है मधुकर

जिससे तू बात निज मन की, यूँ हौले से छुपाती है








.

अगला लेख: ये बारिश प्रेम की



रेणु
10 दिसम्बर 2018

सुस्वागतम शिशिर जी |

रेणु
09 दिसम्बर 2018

किसी अपने को समर्पित बहुत ही भाव स्पर्शी रचना आदरनीय शिशिर जी - बड़े शब्द कौशल से तंज कसा है --
मुझे भी वो हुनर दे दे, जो तेरे पास है मधुकर
ससे तू बात निज मन की, यूँ हौले से छुपाती है!!!!!!!!!!
सस्नेह बधाई |

शिशिर मधुकर
10 दिसम्बर 2018

आपकी खूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से शुक्रिया आदरणीय रेनू जी .......

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