"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते रहे अनेक। किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।

15 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (71 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्तक"


हार-जीत के द्वंद में, लड़ते रहे अनेक।

किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।

बर्छी भाला फेंक दो, विषधर हुई उड़ान-

महँगे खर्च सता रहे, छोड़ो युद्ध विवेक।।-1


हार-जीत किसको फली, ऊसर हुई जमीन।

युग बीता विश्वास का, साथी हुआ मशीन।

बटन सटन है साथ में, लगा न देना हाथ-

यंत्र- यंत्र में तार है, जुड़ मत जान नगीन।।-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "पद" कोयल कुहके पिय आजाओ, साजन तुम बिन कारी रैना,डाल पात बन छाओ।।



महातम मिश्रा
21 दिसम्बर 2018

मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, इस सृजन को विशिष्ट रचना का सम्मान देने के लिए व दैनिक पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

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"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते मनुज अनेक।किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।बर्छी भाला फेंक दो, विषधर हुई उड़ान-पीड़ा सतत सता रहीं, छोड़ो युद्ध विवेक।।-1हार-जीत किसको फली, ऊसर हुई जमीन।युग बीता विश्वास का, साथी हुआ मशीन।बटन सटन दुख दर्द को, लगा न देना हाथ-यंत्र- यंत्र में तार है, जुड़ते जान नगीन।।-2
30 नवम्बर 2018
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