साधना - - दिनचर्या के कार्यों के साथ - साथ

25 दिसम्बर 2018   |  उदय पूना   (45 बार पढ़ा जा चुका है)

^^^^^ साधना -

- दिनचर्या के कार्यों के साथ - साथ ^^^^^


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साधना, जिसके लिए अलग समय देने की आवश्यकता नहीं;

ऐसी साधना की बात करें।

साधना, जो दिन प्रतिदिन के कार्यों को करते हुए की जा सके;

ऐसी साधना की बात करें।


स्वयं से जुड़े रहना;

होश में बने रहना;

बड़ी उपलब्धियां हैं;

उन्हें पाने की बात करें।।


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बात को स्पष्ट करने के लिए, कुछ उदाहरण लेकर चलते हैं;

फिर, साधना करने वाला व्यक्ति, जैसा चाहे, अपनी दिनचर्या से, कोई भी कार्य चुन सकते हैं;

और अपने चुने हुए कार्य के साथ, यह अभ्यास कर सकते हैं।


अपनी सुविधा अनुसार कोई सा भी कार्य चुन सकते हैं;

और जब सुविधा लगे, तो यह अभ्यास कर सकते हैं।


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पहला उदाहरण, लिफ्ट ( Lift ) के सामने खड़े हैं;

तो उसके, ऊपर के - नीचे के, दोनों दिशा के, बटन दिखें;

जिस दिशा में जाना है, उसी दिशा का बटन दबे।

और लिफ्ट के अंदर जाकर;

जिस माला ( Floor ) पर उतरना है, उसी माला का बटन दबे।


जिस माला पर उतरना है, उसी माला पर उतरा करें;

कार्य को सचेत हो करने का अभ्यास करें।


जब लिफ्ट चलना शुरू करे, तो चलने का पता चले;

जब रुके, तो उसके रुकने का पता चले;

कम से कम, स्थूल परिवर्तनों का पूरा पूरा पता चले।


()

अगला उदाहरण, जब भोजन करते हैं, ग्रास ( कौर, निवाला ) मुंह में लेते हैं, पूरा पूरा पता चले;

लार बनने का पता चले, पूरे पूरे स्वाद, आदि आदि का पता चले।


()

भावना से जुड़ा उदाहरण, जब अनायास कोई प्रियजन मिल जाता है;

अंदर उठते भावों का पूरा पूरा पता चले;

जब कुछ प्रतिकूल घट जाता है, तब भी भावों का पूरा पूरा पता चले।


()

यह सब है होश बढ़ाने की, होश में बने रहने की साधना;

स्वयं से जोड़ स्थापित करने की, स्वयं से जुड़े रहने की साधना।


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फिर से लेते हैं एक उदाहरण, जब पोंछा करने के लिए कपड़ा उठाया;

तो कपड़ा सूखा है, कितना गीला है, पता चले;

जब फर्श पर कपड़ा डाला, तो सीधा या उल्टा रखा, पता चले।


()

साधना का उचित दिशा में, इतना छोटा कदम उठाना है;

कि बोझा जैसा मालूम ना पड़े।

दिनचर्या, और जीवन ज्यों का त्यों चलता रहे;

यह साधना करने से, कुछ भी विघ्न या रुकावट ना पड़े।


हमारी पांच वाह्य इंद्रियां हैं, और मन है;

हमें पता चलता रहे कि प्रत्येक में क्या-क्या होता है।

पर शुरुआत में, अभ्यास को सरल बनाने के लिए;

किसी एक इंद्रिय को चुन सकते हैं;

समय के साथ सभी इंद्रियां और मन को अभ्यास में जोड़ सकते हैं।


()

अभ्यास में गहराई बढ़ाते जाना है;

स्थूल स्तर पर, सूक्ष्म स्तर पर, गहनता लाते जाना है;

संवेदना का जितना विस्तृत अनुभव मिले, करते जाना है।


कभी-कभी, बीच बीच में;

सिर्फ एक ही इंद्रिय पर पूरा पूरा ध्यान लगा देना है;

एक ही इंद्रिय की संवेदनों से पूरी तरह से, पूरी गहराई से, पूरी गहनता से जुड़ना है।


()

फिर वर्तमान में रहने का अभ्यास होने लगेगा;

फिर धीरे-धीरे मन स्थिर होने लगेगा।

अकारण ही अंदर प्रसन्नता जागने लगेगी;

सहजता, सरलता बढ़ने लगेगी।


आगे बढ़ने की राह मिलने लगेगी;

आगे बढ़ने की राह खुलने लगेगी।


इससे लाभ होगा, यह अभ्यास करें, शुरू करें;

धीरे-धीरे यह जम जाएगा;

स्वयं के स्वभाव में, प्रकृति में धीरे-धीरे आ जाएगा।


हम भूत में चले जाते हैं या भविष्य में चले जाते हैं;

या किसी विचार की धारा में बहने लगते हैं।

इस अभ्यास के साथ हम वर्तमान में आ जाते हैं;

यह लाभ तुरंत ही मिल जाता है, हम होश में आ जाते हैं।


()

स्वयं से जुड़े रहना;

होश में बने रहना;

बड़ी उपलब्धियां हैं;

उन्हें पाने की बात करें।


()

हम यह साधना करते रहें;

हमारी कामना है, हम सफलता पाते रहें।


उदय पूना,

९२८४७ ३७४३२,

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