"कुंडलिया"

27 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (47 बार पढ़ा जा चुका है)

"कुंडलिया" - शब्द (shabd.in)

"कुंडलिया"


मारे मन बैठी रही, पुतली आँखें मीच।

लगा किसी ने खेलकर, फेंक दिया है कीच।।

फेंक दिया है कीच, तड़फती है कठपुतली।

हुई कहाँ आजाद, सुनहरी चंचल तितली।।

कह गौतम कविराय, मोह मन लेते तारे।

बचपन में उत्पात, बुढापा आ मन मारे।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "भोजपुरी गीत" साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरई जाओ जनि छोड़ी के बखरिया झूले तिरई....... साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरई




मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, इस कुंडलिया सृजन को विशिष्ट रचना का सम्मान देने के लिए व दैनिक पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
26 दिसम्बर 2018
"
मत्तगयन्द सवैये के अंतर्गत 7 भगण और अंत मे दो गुरु का प्रयोग होता है। 16/16 पर यति भी दे दी जाय तो रचना और निखर जाती है।साधारण शब्दों मे मत्तगयन्द सवैये की मापनी इस तरह.होती है ----- 211/211/211/211/211/211/211/22 मत्तगयन्द सवैया छंद ७ भगण +२ गुरु = २३ वर्ण ] वर्णिक मात्रा प्रभार ३२ ] १२ /११ वर्ण /
26 दिसम्बर 2018
15 दिसम्बर 2018
छंद - " मदिरा सवैया " (वर्णिक ) *शिल्प विधान सात भगण+एक गुरु 211 211 211 211 211 211 211 2 भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भा"छंद मदिरा सवैया" वाद हुआ न विवाद हुआ, सखि गाल फुला फिरती अँगना।मादक नैन चुराय रहीं, दिखलावत तैं हँसती कँगना।।नाचत गावत लाल लली, छुपि पाँव महावर का रँगना।भूलत भान बुझावत हौ
15 दिसम्बर 2018
28 दिसम्बर 2018
"
"मुक्तक" नहीं सहन होता अब दिग को दूषित प्यारे वानी। हनुमान को किस आधार पर बाँट रहा रे प्रानी।जना अंजनी से पूछो ममता कोई जाति नहीं-नहीं किसी के बस होता जन्म मरण तीरे पानी।।-1मानव कहते हो अपने को करते दिग नादानी।भक्त और भगवान विधाता हरि नाता वरदानी।गज ऐरावत कामधेनु जहँ पीपल पूजे जाते-लिए जन्म भारत मे
28 दिसम्बर 2018
15 दिसम्बर 2018
"
"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते रहे अनेक।किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।बर्छी भाला फेंक दो, विषधर हुई उड़ान-महँगे खर्च सता रहे, छोड़ो युद्ध विवेक।।-1हार-जीत किसको फली, ऊसर हुई जमीन।युग बीता विश्वास का, साथी हुआ मशीन।बटन सटन है साथ में, लगा न देना हाथ-यंत्र- यंत्र में तार है, जुड़ मत जान नगीन।।-2
15 दिसम्बर 2018
01 जनवरी 2019
बह्र- 2122 2122 2122 2122 रदीफ़- चलते बने थे, काफ़िया- आ स्वर"गज़ल" जिंदगी के दिन बहुत आए हँसा चलते बने थेनैन सूखे कब रहे की तुम रुला चलते बने थेदिन-रात की परछाइयाँ थी घूरती घर को पलटकरदिन उगा कब रात में किस्सा सुना चलते बने थे।।मौन रहना ठीक था तो बोलने की जिद किये क्योंकाठ न था आदमी फिर क्यों बना चलते
01 जनवरी 2019
08 जनवरी 2019
"
मापनी-1222 1222 1222 1222, समान्त- आर का स्वर, पदांत- हो जाना"गीतिका"अभी है आँधियों की ऋतु रुको बाहार हो जानाघुमाओ मत हवाओं को अजी किरदार हो जानावहाँ देखों गिरे हैं ढ़ेर पर ले पर कई पंछीउठाओ तो तनिक उनको सनम खुद्दार हो जाना।।कवायत से बने है जो महल अब जा उन्हें देखोभिगाकर कौन रह पाया नजर इकरार हो जाना
08 जनवरी 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
21 दिसम्बर 2018
11 जनवरी 2019
11 जनवरी 2019
13 दिसम्बर 2018
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x