"कुंडलिया"

27 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (104 बार पढ़ा जा चुका है)

"कुंडलिया"

"कुंडलिया"


मारे मन बैठी रही, पुतली आँखें मीच।

लगा किसी ने खेलकर, फेंक दिया है कीच।।

फेंक दिया है कीच, तड़फती है कठपुतली।

हुई कहाँ आजाद, सुनहरी चंचल तितली।।

कह गौतम कविराय, मोह मन लेते तारे।

बचपन में उत्पात, बुढापा आ मन मारे।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, इस कुंडलिया सृजन को विशिष्ट रचना का सम्मान देने के लिए व दैनिक पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

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