"मुक्तक"

28 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (85 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्तक"


नहीं सहन होता अब दिग को दूषित प्यारे वानी।

हनुमान को किस आधार पर बाँट रहा रे प्रानी।

जना अंजनी से पूछो ममता कोई जाति नहीं-

नहीं किसी के बस होता जन्म मरण तीरे पानी।।-1


मानव कहते हो अपने को करते दिग नादानी।

भक्त और भगवान विधाता हरि नाता वरदानी।

गज ऐरावत कामधेनु जहँ पीपल पूजे जाते-

लिए जन्म भारत में कैसे बन नेता अभिमानी।।-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, इस मुक्तक सृजन को विशिष्ट रचना का सम्मान देने के लिए व दैनिक पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

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