"मदिरा सवैया"

29 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (19 बार पढ़ा जा चुका है)

सवैया "मदिरा" मापनी -- 211/211/211/211/211/211/211/2


"छंद मदिरा सवैया"


नाचत गावत हौ गलियाँ प्रभु गाय चरावत गोकुल में।

रास रचावत हौ वन में क्यों धूल उड़ावत गोधुल में।।

जन्म लियो वसुदेव घरे मटकी लुढ़कावत हौ तुल में।

मोहन मोह मयी मुरली मन की ममता महके मुल में।।-1


आपुहिं आपु गयो तुम माधव धाम बसा कर छोड़ गए।

का गति आज भई यमुना जल मीन पिलाकर मोड़ गए।।

लागत नीक न शोभत साधक साधु बनाकर जोड़ गए।

आपु भले अपना समझे पर प्रीत पढ़ाकर तोड़ गए।।-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "भोजपुरी गीत" साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरई जाओ जनि छोड़ी के बखरिया झूले तिरई....... साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरई



मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, मदिरा छंद सृजन को श्रेष्ठ रचना का सम्मान देने के लिए व मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

आप को भी नव वर्ष की मांगलिक बधाई बहन, सपरिवार शुभाशीष

रेणु
31 दिसम्बर 2018

आदरणीय भैया -- नववर्ष की बेला पर आपको सपरिवार हार्दिक बधाई और शुभकामनायें | नववर्ष आप और आपके परिवार के लिए अत्यंत सुखद और मंगलकारी हो यही कामना है | सपरिवार सलामत रहिये मेरे भाई |

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
26 दिसम्बर 2018
वज़्न--212 212 212 212, अर्कान-- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन, बह्रे- मुतदारिक मुसम्मन सालिम, क़ाफ़िया— करते, (अते की बंदिश) रदीफ़ --- रहे"गज़ल" पास आती न हसरत बिखरते रहेचाहतों के लिए शोर करते रहेकारवाँ अपनी मंजिल गया की रुकाकुछ सरकते रहे कुछ फिसलते रहे।।चंद लम्हों की खातिर मिले थे कभीकुछ भटकते रहे कु
26 दिसम्बर 2018
11 जनवरी 2019
"कुंडलिया"मेला कुंभ प्रयाग का, भक्ति भव्य सैलाबजनमानस की भावना, माँ गंगा पुर आबमाँ गंगा पुर आब, लगे श्रद्धा की डुबकीस्वच्छ सुलभ अभियान, दिखा नगरी में अबकीकह गौतम कविराय, भगीरथ कर्म न खेलाकाशी और प्रयाग, रमाये मन का मेला।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
11 जनवरी 2019
15 दिसम्बर 2018
छंद - " मदिरा सवैया " (वर्णिक ) *शिल्प विधान सात भगण+एक गुरु 211 211 211 211 211 211 211 2 भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भा"छंद मदिरा सवैया" वाद हुआ न विवाद हुआ, सखि गाल फुला फिरती अँगना।मादक नैन चुराय रहीं, दिखलावत तैं हँसती कँगना।।नाचत गावत लाल लली, छुपि पाँव महावर का रँगना।भूलत भान बुझावत हौ
15 दिसम्बर 2018
15 दिसम्बर 2018
छंद - " मदिरा सवैया " (वर्णिक ) *शिल्प विधान सात भगण+एक गुरु 211 211 211 211 211 211 211 2 भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस भा"छंद मदिरा सवैया" वाद हुआ न विवाद हुआ, सखि गाल फुला फिरती अँगना।मादक नैन चुराय रहीं, दिखलावत तैं हँसती कँगना।।नाचत गावत लाल लली, छुपि पाँव महावर का रँगना।भूलत भान बुझावत हौ
15 दिसम्बर 2018
सम्बंधित
लोकप्रिय
"
28 दिसम्बर 2018
21 दिसम्बर 2018
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x