"मदिरा सवैया"

29 दिसम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (67 बार पढ़ा जा चुका है)

सवैया "मदिरा" मापनी -- 211/211/211/211/211/211/211/2


"छंद मदिरा सवैया"


नाचत गावत हौ गलियाँ प्रभु गाय चरावत गोकुल में।

रास रचावत हौ वन में क्यों धूल उड़ावत गोधुल में।।

जन्म लियो वसुदेव घरे मटकी लुढ़कावत हौ तुल में।

मोहन मोह मयी मुरली मन की ममता महके मुल में।।-1


आपुहिं आपु गयो तुम माधव धाम बसा कर छोड़ गए।

का गति आज भई यमुना जल मीन पिलाकर मोड़ गए।।

लागत नीक न शोभत साधक साधु बनाकर जोड़ गए।

आपु भले अपना समझे पर प्रीत पढ़ाकर तोड़ गए।।-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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मंच व मित्रों का हृदय से आभारी हूँ, मदिरा छंद सृजन को श्रेष्ठ रचना का सम्मान देने के लिए व मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित करने के लिए, सादर नमन

आप को भी नव वर्ष की मांगलिक बधाई बहन, सपरिवार शुभाशीष

रेणु
31 दिसम्बर 2018

आदरणीय भैया -- नववर्ष की बेला पर आपको सपरिवार हार्दिक बधाई और शुभकामनायें | नववर्ष आप और आपके परिवार के लिए अत्यंत सुखद और मंगलकारी हो यही कामना है | सपरिवार सलामत रहिये मेरे भाई |

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