चुनाव चिन्ह जूता।

04 जनवरी 2019   |  जानू नागर   (76 बार पढ़ा जा चुका है)

चुनाव चिन्ह जूता।


लोकलाज सब त्याग, जूता निशान बनाया।

झाड़ू से सफाई कर, बाद मे जूता दीना।

पढ़ लिख कर मति बौराई, कौन इन्हे समझाए?

लोक सभा चुनाव से पहले जूता निशान बनाए।

हरि बैल,खेत-किसान, खत का निशान मिटाया।

वीर सपूतो की फाँसी वाली रस्सी को ठुकराया।

उन वीरांगनाओ को भूल गए जिसने खट्टे दाँत किये।

दिल्ली को बना के चमचम, पूरे देश मे जूता बाट दिए।

अब निशान घाँघरा-चोली रब्बा-राम इनको बचाए।

बस चले चुनाव आयोग का तो इनको भी बेच खाए।

बना जूता काँटो मे चलने के लिए, कौन फूल अब इनमे बरसाए?

पहले बना जूतो का माला कौन इन्हे पहनाए?

वाह रे हरि! कैसे पढे लिखो का ध्यान ज्ञान सब छीना?

सुख-चैन छीन किसान का, गन्ना-गुड, आलू खेत मे सड़ाया।

अगला लेख: छोड़ेंगे न साथ।



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
15 जनवरी 2019
पहले के दास आज के संत-योगी आज के संतो व योगी मे बहुत फर्क हैं। पहले का दास राजा के अधीन होकर अपनी रचनाओं से उन्हे सब कुछ बता देते थे। इनाम पाकर अपने आप को धन्य समझते थे। आज के योगी संत, राजा बनकर भी कुछ नहीं हासिल कर पाते। भगवान को, वह अपना आईना समझते हैं, और उसमे अपना बंदरो की तरह बार-बार चेहरा द
15 जनवरी 2019
11 जनवरी 2019
चु
इस चुनावी समर का हथियार नया है। खत्म करना था मगर विस्तार किया है। जिन्न आरक्षण का एक दिन जाएगा निगल, फिलहाल इसने सबपे जादू झार दिया है। अब लगा सवर्ण को भी तुष्ट होना चाहिए। न्याय की सद्भावना को पुष्ट होना चाहिए। घूम फिर कर हम वहीं आते हैं बार बार, सँख्यानुसार पदों को संतु
11 जनवरी 2019
17 जनवरी 2019
बा
बात और थोड़े दिन की।चुरा लो और क्या चुराओगे?पूछेगीं नज़रे,तो क्या बताओगे?जुबान चुप होगी, होठ सिल जाएंगे।मयते कब्र मे दफ़न हो जाएंगी।अब वक्त शुरू हुआ हैं, विलय का।बैंक ही नहीं सबकुछ विलय हो जाएगा।चलता रहा यू ही कारवां, आने वाली पीढ़ियाँ भी विलय हो जाएंगी।खोजते रहना जाति, धर्म, जब इंसानियत ही विलय हो जाएग
17 जनवरी 2019
18 जनवरी 2019
सच रो रहाशिक्षित प्रशिक्षितधरना और जेल मे।नेता अभिनेतासंसद और बुलट ट्रेन मे।एमेड बीएडतले पकोड़ा खेतवा की मेड़ मे।योगी संत महत्मासेलफ़ी लेवे गंगा की धार मे।बोले जो हककी बात वह भी जिला कारागार मे।बोले जो झूठमूठ वह बैठे सरकारी जैगुआर मे।कर ज़ोर जबरदसतीन्याय को खा जाएंगे।की अगर हककी बात तो लाठी डंडा खा जाएं
18 जनवरी 2019
02 जनवरी 2019
न छेड़ो प्रकृति को आज भी हवाए अपने इशारे से बादलो को मोड़ लाती हैं। गर्म सूरज को भी पर्दे की ओट मे लाकर एक ठंडा एहसास जगाती हैं। रात की ठंड मे छुपता चाँद कोहरे की पर्त मे, उस पर्त को भी ये उड़ा ले जाती हैं। प्रकृति आज भी अपने वजूद और जज़बातो को समझती हैं हर मौसम को।पर मानव उनसे कर खेलवाड़, अपने लिए ही मु
02 जनवरी 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x