"मुक्तक"

11 जनवरी 2019   |  महातम मिश्रा   (62 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्तक"


मंदिर रहा सारथी, अर्थ लगाते लोग।

क्या लिख्खा है बात में, होगा कोई ढोंग।

कौन पढ़े किताब को, सबके अपने रूप-

कोई कहता सार है, कोई कहता रोग।।-1


मंदिर परम राम का, सब करते सम्मान।

पढ़ना लिखना बाँचना, रखना सुंदर ज्ञान।

मत पढ़ना मेरे सनम, पहरा स्वारथ गीत-

चहरों पर आती नहीं, बे-मौसम मुस्कान।।-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "चौपाई मुक्तक" वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई। रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।



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