"छंद दुर्मिल सवैया" चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी। अकुलात जिया मन लागत का छड़ राजन काहुँ गए बहरी।

12 जनवरी 2019   |  महातम मिश्रा   (45 बार पढ़ा जा चुका है)

दुर्मिल सवैया ( वर्णिक )शिल्प - आठ सगण, सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा सलगा 112 112 112 112 112 112 112 112, दुर्मिल सवैया छंद लघु से शुरू होता है ।छंद मे चारों पंक्तियों में तुकांत होता है


"छंद दुर्मिल सवैया"


चित भावत नाहिं दुवार सखी प्रिय साजन छोड़ गए बखरी।

अकुलात जिया मन लागत का छड़ राजन काहुँ गए बहरी।

तकि जात नहीं उनकी रहिया पग भार दिखात बहे नहरी।

सखि साँच कहूँ तुमसे बलमा पछितात हुँवें अफरा तफरी।।-1


कल की वह बात कहुँ तुमसे लगिगै नयना फुलवार गली।

बिच आय गए देवरा उठि के मुसुकाय गई कचनार कली।

यह दृश्य चिढ़ाय गयो उनको रिसियाय उठे कस रात ढली।

मन शंकित चोर खलेल मचा निकले घर से तजि द्वार भली।।-2


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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