विम्ब का ये प्यार

15 जनवरी 2019   |  विजय कुमार तिवारी   (42 बार पढ़ा जा चुका है)

गीत(09/05/1978)

विम्ब का ये प्यार

विजय कुमार तिवारी


कौन दूर से रहा निहार?

दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार,

विम्ब का ये प्यार।


पोखरी से फिसल चले हैं पाँव ये,

जिन्दगी की कैसी है ढलाँव ये।

आज हाथ केवल है हार,

दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार,

विम्ब का ये प्यार।


धड़कने सिसकाव का सहारा ले,

मिट रही बढ़त यहाँ किनारा ले।

अदायें आज कर रहीं चित्कार,

दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार,

विम्ब का ये प्यार।


गूँज नहीं, मात्र यहाँ क्रन्दन है,

दीप्ति नहीं, मरघट का नर्तन है।

बैठ यहाँ कर रहा गुहार,

दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार,

विम्ब का ये प्यार।


उदास राग-रागिनी यहाँ,

निराश रश्मि-यामिनी यहाँ।

सिर्फ सर्प-दंश बेशुमार,

दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार,

विम्ब का ये प्यार।


नियति-नटी के प्रेम का आह्वान,

सबने किया ईश्क की रुझान।

कौन सुने विजय की पुकार?

दिल ने कहा-खोलता हूँ द्वार,

विम्ब का ये प्यार।

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