सपने की हकीकत

16 जनवरी 2019   |   पवन श्रृंगी   (64 बार पढ़ा जा चुका है)

कल रात को मैंने एक सपना देखा भीड़ भरे बाज़ार में नहीं कोई अपना देखा मैंने देखा एक घर की छत के नीचे कितनी अशांति कितना दुख और कितनी सोच मैंने देखा चेहरे पे चेहरा लगाते हैं लोग ऊपर से हँसते पर अंदर से रोते हैं लोग भूख, लाचारी, बीमारी, बेकारी यही विषय है बात का आँख खुली तो देखा यह सत्य है सपना नहीं रात का वास्तव में देखो तो यह कहानी घर-घर में दोहराई जाती है कोई बेटी जलती है तो कोई बहु जलाई जाती है कितनों के सुहाग उजड़ते रोज तो कई उजाड़े जाते है यह सब करके भी बतलाओ क्या लोग शांति पाते हैं ? कितनी सुहागिनें हुई विधवा कितने बच्चे अनाथ हुए कितना दुख पाया जीवन में और ज़ुल्म सबके साथ हुए

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