यादों का पागलखाना

19 जनवरी 2019   |  एस. कमलवंशी   (88 बार पढ़ा जा चुका है)

यादों का पागलखाना

जब भी तेरी वफाओं का वह ज़माना याद आता है,

सच कहूं तो तेरी यादों का पागलखाना याद आता है।


कसमों की जंजीर जहां पर, वादों से बनी दीवारें हैं

झूठ किया है खंज़र से तेरे नाम की उन पर दरारें है।

टूट चुका सपनों का बिस्तर, अफ़सोसों की चादर है

तकियों को गीला करती अश्क़ों की जहां फुहारें हैं।


जलती शमा में कैद वहां, परवाना याद आता है,

सच कहूं तो तेरी यादों का पागलखाना याद आता है।


तेरी छुअन फिर क़ातिल बन उसका इलाज़ जब करती है

भरती है रगों में ज़हर कोई, उसे लाइलाज़ सा करती है।

लगते झटके सदमों के जब, बेहोशी गिर पड़ता है

हाल देख, परछाई तेरी उस पर मजाक सा करती है।


अपने साये से लड़ता, दीवाना याद आता है,

सच कहूं तो तेरी यादों का पागलखाना याद आता है।


अरसे हुए उस कैदी को, किसी राह में नज़रें बिछाता है,

‘तू खुश रहे, तू खुश रहे’, कोई ऐसा नगमा गाता है।

वह खुद को सजाएं देता है, मरने की कोशिश करता है

न हो जाए बदनाम सनम, यह सोचकर थम जाता है।


फिर कोरे कागज़ पर उसका, यह लिख जाना याद आता है,

“सच कहूं तो तेरी यादों का पागलखाना याद आता है ”।

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भावों का बहुत ही सटीक चित्रण।

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