पर्दे भी डसने से लगते हैं।

24 जनवरी 2019   |  जानू नागर   (35 बार पढ़ा जा चुका है)

पर्दे भी डसने से लगते हैं।

घर से निकली औरत, कोहरे मे काम के लिए।

खूब कसी ऊनी कपड़ो से, लटका बैग कंधो मे।

इधर कोई न, उधर कोई, लिए गीत अधरों मे।

देख अंधेरा चरो-ओर ले, कदमो को रफ्तार मे।

वह गलियारो मे, अपने पगचिन्हों को छोडती।

झोड़, नाली-नाले ककरीली पथरीली सड़को मे।

खेत, रेत,सब पार किया शमशान की मुडेरों से।

वह निकली कोहरे की घूँघट को चीर-फाड़ कर।

लिपटा कोहरे की चादर मे, अपना कौन पराया?

बुनती रही धागे तरह-तरह के, जब तक मंजिल मिली नहीं।

भर सांस, जहन और कोहरे मे,कही रुकी नहीं,कही डरी नहीं।

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