स्त्री हठ कि धनी हो

31 जनवरी 2019   |  Vikas Khandelwal   (32 बार पढ़ा जा चुका है)

छोड़ दो जिद अपनी

बन जाएगी बात अपनी


मानता हु कि तुम


स्त्री हठ कि धनी हो


मगर पत्थर कि तो नहीं बनी हो


ममता और वात्सल्य तुम्हारे गहने है


इनको पहन के हि तो


तुम माँ बनी हो


छोड़ दो जिद अपनी


तुम्हारी नाराजगी से


मेरी आँखों मे आ गया है पानी


छोड़ दो जिद अपनी


ठहर सी गई है ज़िन्दगी अपनी


मानता हु कि तुम आहत हुई हो


मेरी बातो से घबरा गई हो


मै भी मगर कम शर्मिन्दा नहीं हू


मेरी खताओं को माफ़ कर दो


सच कहता हू ,


तुम्ही और सिर्फ तुम्ही


मेरे दिल कि रानी हो


माना कि तुम जननी हो


हम सबकी , हमसे ज्यादा


सोचने वाली ग्रहणी हो


फिर भी मन के हाथो मजबूर हो


जाने किस सोच में डूबी हो


आ जाओ मेरे करीब जरा


तुम सिर्फ मेरे लिए बनी हो


छोड़ दो जिद अपनी














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