चाँद हंसिया रे !

02 फरवरी 2019   |  रेणु   (79 बार पढ़ा जा चुका है)

चाँद  हंसिया रे !  - शब्द (shabd.in)

चाँद हंसिया रे ! सुन जरा !

ये कैसी लगन जगाई तूने ?

कब के जिसे भूले बैठे थे -

फिर उसकी याद दिलाई तूने !!


गगन में अकेला बेबस सा -

तारों से बतियाता तू

नीरवता के सागर में -

पल - पल गोते खाता तू ;

कौन खोट करनी में आया ? \

ये बात ना कभी बताई तूने !!


किस जन्म किया ये महापाप ?

शीतल हो भी सहा चिर संताप ;

दूर सभी अपनों से रह -

ढोया सदियों ये कौन शाप ?

नित -नित घटता -बढ़ता रहता

नियति कैसी लिखवाई तूने ?


तेरी रजत चांदनी मध्यम सी -

जगाती मन मेंअरमान बड़े ,

यूँ ही ये सजा बैठा सपने जो -

हैं भ्रम से -करते हैरान बड़े

मुझ सा - तू भी है तन्हा-

ना जानी पर पीर पराई तूने !!!!!!!!!!


स्वरचित -- रेणु

चित्र -- गूगल से साभार

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मीमांसा --- mimansarenu550.blogspot.com

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अनीता सैनी
16 फरवरी 2019

बहुत सुन्दर रचना सखी

रेणु
16 फरवरी 2019

प्रिया अनिता |-- आपको इस मंच पर पाकर मन आह्लादित है --| सुस्वागतम और आभार सखी |

शिशिर मधुकर
05 फरवरी 2019

अति सुन्दर ......

रेणु
05 फरवरी 2019

सुस्वागतम और आभार आदरणीय शिशिर जी |

अतिसुन्दर

रेणु
05 फरवरी 2019

सुस्वागतम और आभार प्रिय इंद्र जी

वाह! हृदयस्पर्शी रचना जिसमें एक अंतर्कथा आगे बढ़ती जाती है।

बधाई एवं शुभकामनाएँ।

रेणु
04 फरवरी 2019

सादर आभार रवीन्द्र जी

Aparna
04 फरवरी 2019

बहुत सुंदर

रेणु
04 फरवरी 2019

सस्नेह आभार अपर्णा जी |

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