एक नज़र इधर भी

06 फरवरी 2019   |  जानू नागर   (5 बार पढ़ा जा चुका है)

एक नज़र इधर भी

आँख से नींद बनी,

पेट से खेत बना,

बच्चे से प्यार बना।

जीवन साथी से जीना।

क्या रखा हैं इस धनदौलत मे?

ये तो हैं मानव के मन को गुमराह करने का बहाना।

पूज लो माँ-बाप को जीससे बनी ये काया।

क्यों फिरता हैं जग मे, बंदा तू मारा-मारा?

दिल, दिमाग, मन चंचल, इससे सब कोई हारा।

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