नाव

25 फरवरी 2019   |  शिशिर मधुकर   (40 बार पढ़ा जा चुका है)

जिसे तुम ज़िन्दगी में सबसे ज्यादा प्यार करते हो

झिझक को छोड़ कर पीछे उसे बाँहों में भरते हो


ज़मीं का साथ पाकर ही शज़र पे रंग आता है

चुकाने को कर्ज थोड़ा फूल तुम उस पे झरते हो


तेरे सीने से लगने की तमन्ना दिल में रहती है

मेरी हर एक पीड़ा तुम बड़ी शिद्दत से हरते हो


मुझे उन राहों पे चलने से हरदम मान मिलता है

जिन पे हँसते हुए ये बाँह पकडे तुम गुजरते हो


इस गहरे समुन्दर में तुम तो वो नाव हो मेरी

बिना जिसके पार मधुकर कभी भी ना उतरते हो


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