उस फागुन की होली में

09 मार्च 2019   |  रेणु   (47 बार पढ़ा जा चुका है)

उस फागुन की होली में  - शब्द (shabd.in)

जीना चाहूं वो लम्हे बार बार

जब तुमसे जुड़े थे मन के तार

जाने उसमें क्या जादू था ?

ना रहा जो खुद पे काबू था

कभी गीत बन कर हुआ मुखर

हंसी में घुल कभी गया बिखर

प्राणों में मकरंद घोल गया

बिन कहे ही सब कुछ बोल गया

इस धूल को बना गया चन्दन

सुवासित , निर्मल और पावन

कभी चाँद हुआ कभी फूल हुआ

या चुभ हिया की शूल हुआ

लाल था कभी - कभी नीला

कभी सिंदूरी - कभी पीला

कोरे मन को रंग निकल गया

कभी अश्रु बनकर ढुलक गया

ना खबर हुई क्या ले गया और-

भर गया क्या खाली झोली में

वो चुटकी भर..अबीर तुम्हारा

उस फागुन की होली में !!!!!!!!!

स्वरचित -- रेणु-

चित्र -- गूगल से साभार

कृपया मेरे ब्लॉग पर पधारे ---

क्षितिज ---- renuskshitij.blospot.com

मीमांसा --- mimansarenu550.blogspot.com


अगला लेख: हार्दिक अभिनन्दन !



जीना चाहूं वो लम्हे बार बार जब तुमसे जुड़े थे मन के तार जाने उसमें क्या जादू था ? ना रहा जो खुद पे काबू थाबेहतरीन

रेणु
19 मार्च 2019

सादर आभार आदरणीय पुरुषोत्तम जी |

जीना चाहूं वो लम्हे बार बार जब तुमसे जुड़े थे मन के तार जाने उसमें क्या जादू था ? ना रहा जो खुद पे काबू थाबेहतरीन

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x